Tuesday, April 16, 2013

भारत भाग्य विधाता ...!


फ्रेडरिक नीत्से को मानने वाले कम नहीं जिसका मानना था कि ईश्वर मर चुका है, जबकि नास्तिको के दो वर्ग है, एक का मानना है, ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं, जबकि दूसरा वर्ग यह मानता है कि ईश्वर का कोई प्रमाण नहीं...

 

कम्युनिस्ट विचारधारा धर्म को अफीम मानती मानती, स्टालिन, माओ और लेनिन के पिछौटे को थामे पहले तो उनकी अनुगामी बनी फिर भक्त बन गयी और सबसे महान व्यक्ति "पूजको" में कब बदल गयी पता ही नहीं चला...!

 

"अहम् ब्रह्मास्मि" का नारा भी जब तब सुनाई देता ही रहा है, मध्य काल में सरमद के ‘’अनलहक़, अनलहक़…‘ की गवाह दिल्ली की जामा मस्जिद अभी तक मौजूद है, पर बात यही नहीं ख़त्म होती|

 

महात्मा गाँधी के "भगवान राम" आर एस एस को स्त्रीय लगते लगते नब्बे तक आते आते युद्ध घोष के नायक लगने लगे तो हैम् सैंड विच और पोर्क सौसिज़ के शौक़ीन, शराब प्रेमी और कभी भी नमाज न अदा करने वाले मुहम्मद अली ज़िन्ना एक इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान के झंडाबरदार बन बैठे...

 

धर्म को पाखंड घोषित करते करते "कांचा इलैया " पोर्क बीफ फ़ूड फेस्टिवल आयोजित करने लगते है और इसे अपनी आजादी से जोड़ देते है, और उनकी यह मुर्खता भरी सनक धर्म के झंडाबरदारों को और अधिक मजबूत करने का काम करती है ...

 

आम आदमी इन्हें अपना त्राता मानती है, कुछ धर्म विरोध के जननायक का ढोंग करते है तो कुछ धर्म ध्वज वाहक बन जाते है, वास्तव में तो, सब के सब ढोंग करते है, भईया तुम अपनी आस्था अपने पास रखो, मेरी आस्था मेरे साथ रहने दो, न मै तुमपे तंज करू, न तुम हमें देख जीभ बिराओ, हम उतार देब्बे आपन लाउडस्पीकर तू आपन ढोल मजीरा आपन घर मा रखो, हम सड़के पे नुमाज न पढ्बे, तू मंदिर भीतर आपन हनुमान चालीसा पढयो...!

पर भईया, तब मार कुटाई कैसे होईस, झम्मक झम्मा होवे बदे, कछु तो चहबे करी ...

तो पसमानो लगाओ ठेका और दे दो ताल ...लड़ो बिलारिन, बानर आयो, रोट भी खायो, गोड़ो दबवायो

...बेवकूफ बिल्लियों लड़ो लडती रहो, तभी तो बन्दर तुम्हारी रोटी भी खायेगा और तुम्हारा भाग्य विधाता भी बनेगा!!!

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और अंत में Himanshu Kumarar की एक टीप ;-
भाई हिंदुओं और मुसलमानों तुम्हें ये जान कर बड़ी निराशा होगी कि मुसलमानों का अल्लाह और हिंदुओं का ईश्वर एक ही है, यहूदियों, ईसाईयों और सिक्खों का खुदा भी वही है |
जाओ अब लड़ो बेवकूफों...!

Thursday, April 11, 2013

एम्म नास्तिक धर्म...!



अपनी सुविधा के हिसाब से पाला बदल लेना गलत बात है, मै धार्मिक हूँ, या नास्तिक हूँ यह बात तबतक महत्वपूर्ण नहीं जबतक मेरी आस्तिकता या नास्तिकता किसी को आहत नहीं करती, मै नास्तिक हूँ, इसका यह अर्थ कतई नहीं, कि मै किसी अन्य की आस्था का मजाक उडाऊ, अपनी अंतिम साँसे ले रही माँ के मुह में मै निश्चित ही, तुलसी दल और गंगा जल डालूँगा और इसपर मेरा कोई मित्र अगर मुझे इसे आडम्बर कह के रोकने की कोशिश करेगा, तो यक़ीनन मै उसे एक तमाचा रशीद करूँगा | क्योकि यह मेरा नहीं मेरी अंतिम सांसे ले रही माँ के आस्था का मामला है और उनकी यह आस्था किसी को नुकसान नहीं पहुचती...

मेरे बगीचे में तुलसी के पौधे, मेरे लिए औषधीय पौधे मात्र है, पर अपनी माँ के मौजूद रहने पर उन पौधों को अपने "सेकेटियर" से मै दूर रखता हूँ, क्योकि मेरे माँ के लिए तुलसी पूज्य है, और उनकी कटाई छटाई वर्जित है |

धर्मों का विरोध करते करते हमें पता ही नहीं चलता कि कब हम अपनी नास्तिकता को ही एक धर्म में तब्दील कर लेते है, दुसरो की आस्था का वैज्ञानिक अथवा तार्किक प्रमाण मांगते मांगते हम एकदम भूल जाते है, की हमने भी नास्तिकता को अपनी आस्था बना लिया है ऐसे में मुझे अक्सर अपने मित्र Imtiaz Mahmood से जाहिर की अपनी आशंका अक्सर याद आती है, कि "I fear this no religion would not convert in "NO" religion"
अक्सर अपने तथाकथित नास्तिक मित्रों को मै देखता हूँ कि हालाँकि वो अपने नास्तिक होने का ढोल तो बड़ा तगड़ा पिटते है, पर अपने पारिवारिक धर्म का पक्ष मौका पाते ही लेने लगते है, मसलन "अगर हिन्दू मंदिर जाने के लिए छुट्टी ले सकता है तो मुस्लमान मस्जिद जाने के लिए छुट्टी क्यों नहीं ले सकता" या फिर "अगर मुसलमान जालीदार टोपी पहन सकता है तो वो भगवा शर्ट क्यों नहीं पहन सकता"
और साथ में, यह जरुर जोड़ेगे हालाकि मै नास्तिक हूँ...!
भाई मेरे, काम के समय में चाहे मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा या चर्च कही जाओ ये गलत है और धर्म के नाम पर ड्रेस कोड का उल्लंघन भी गलत है, अब चाहे अगले का नाम वसीम जाफर हो या कपिल देव या नवजोत सिद्धू |
और हाँ मेरे हिसाब से आप का धार्मिक होना मेरे लिए आपको पूज्य बनाएगा अगर वह निर्माण के लिए है (constructive) सबसे महत्वपूर्ण आपका रवैया है, आपका आस्तिक या नास्तिक होना नहीं...
Being constructive or destructive is only important, as far as your believe or disbelieve in religion is concerned...!
(The last line written in English, is the essence of above, so that my foreign friends can understand, the object in some sense)

Wednesday, April 10, 2013

रमाबाई अम्बेडकर बनाम सविता अम्बेडकर !

उत्तरप्रदेश भर में घूमते हुए मुझे सविता अम्बेडकर से सम्बंधित स्मारक एकदम नहीं दिखते, जबकी दो हजार दो तक जीवित रही बाबा साहब की धर्मपत्नी अपने अंतिम साँस तक बाबा साहब के आदर्शो के अनुरूप बहुजन समाज के उत्थान के लिए समर्पित रहीं, उनके जीवित होने के बाद भी, माया मेमसाहब ने कभी भी उनका जिक्र करना मुनासिब नहीं समझा, सम्मानित करना तो दूर की बात है...
लखनऊ शहर भर में रमादेवी अम्बेडकर से जुड़े न जाने कितने स्मारक, पार्क इत्यादि है, जो बाबा साहेब की पहली पत्नी थी, और अल्प काल में स्वर्गवासी हुई...
सविता अम्बेडकर, जन्मना ब्राह्मण थी, और उन्होंने बाबा साहेब से प्रभावित हो कर उनसे विवाह किया था तथा बाबा साहेब के राजनितिक-सामाजिक कार्यो में न सिर्फ उनकी परम सहयोगी थी, बल्कि बाबा साहेब के मरने के बाद, निरंतर उनके आदर्शो पर चलती रही...
पर चुकि वो माया मैडम की पार्टी से नहीं जुड़ी थी, लिहाज़ा बाबा साहेब के नाम की मलाई चाट रही माया मैडम के लिए “सविता अम्बेडकर” का नाम लेना भी किसी पाप से कम नहीं लगता!

ये तो सरासर बेशर्मी है माया मेमसाहब ...!!!

Tuesday, April 9, 2013

हमारे बच्चे हमसे साहसी है

"
कल मेरा भांजा मुझसे मिलने आया ...!
वक़्त ने उसके चेहरे पर युवावस्था की लुनाई की एक परत चमका दी है, लिहाजा उसे देखना आँखों को सुकून दे रहा था, अभी हफ्ते भर पहले जीजा ( सुधाकर मणि त्रिपाठी) से गुफ्तगू के दौरान पता चला की वह फिल्मो में हाथ- पाव मार रहा हैं, दीदी भी थोड़ी संशय में थी, पर मेरी राय थी "अभी उसे उड़ने दो !" उड़ने लगा तो ठीक नहीं तो हम सब तो है, ही ...!!!
मेरा यह पक्के तौर पर मानना है , की अगर बच्चे में संस्कार हैं, वो संवेदनशील है, अपने बड़ो का आदर करना जानता है और परिवार से जुड़ा हुआ है, तो इन बच्चो को रोकिये मत...|
करने दीजिये इन्हें अपने मन की, ये बहुत कुछ वो भी करेंगे, जो अपनी सीमाओ की वजह से , हम चाह कर भी नहीं कर पाए...|
...और हमारे रहते अगर उनकी उडान गलत हुई, तो सम्हालने के लिए हम मौजूद तो है, ही तो ढेर सारा आशीष अपने भांजे को ...!
और हाँ ... अब वो स्वेतांक से करण हो गया है, भूमिका बदलने की भूमिका में ही नाम भी बदल गया...यह अहसास थोड़ा डराता भी है, पर निःसंदेह हमारे बच्चे हमसे साहसी है, इसका आस्वस्ति बोध भी होता है ...|

पच्चीस फ़रवरी की टीप

रेल बजट

"ऊँ सुंदरनगर स्वाहा ऊ बठिंडा स्वाहा ऊँ लुधियाना स्वाहा ऊँ महासमुंद स्वाहा ऊँ तुमकुर स्वाहा, ऊं पडरौना स्वाहा, ऊँ पटियाला स्वाहा- पवन हवन ।

ये रेल बजट नहीं ये पवन हवन है । लीजिए समाप्त हुआ । चरणामृत पी कर कपार में पोंछ लें"

साहिर लुधियानवी की लिखी एक ग़जल

"
इक्कीस बरस गुजरे आज़ादी-ऐ कामिल को
तब जा के कहीं हमको ग़ालिब का ख्याल आया |
तुरबत कहा है उसकी, मसकन था कहाँ उसका,
अब अपने सुखन परवर ज़हनो में सवाल आया |

सौ साल से ये तुरबत चादर को तरसती थी,
आज इसपे अकीदत के फूलों की नुमाविश है |
उर्दू के ताल्लुक से ये भेद नहीं खुलता,
ये जश्न, ये हंगामा, खिदमत है की साजिश है|

जिन शहरों में गूंजी थी, ग़ालिब की नवा बरसो,
उन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ-निशां ठहरी|
आज़ादी-ऐ -कामिल का ऐलान हुआ जिस दिन,
मातूब जुबाँ ठहरी, ग़द्दार जुबां ठहरी |

जिस अहद-ऐ-सियासत ने ये जिंदा जुबाँ कुचली ,
उस अहद -ऐ - सियासत को,महरूमों का ग़म क्यूँ है?
ग़ालिब जिसे कहते हो, उर्दू ही का शायर था ,
उर्दू पे सितम ढा के, ग़ालिब पे करम क्यूँ हैं ?

ये जश्न ये हंगामे दिलचस्प खिलौने हैं
कुछ लोंगो की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाये|
जो वादा-ऐ-फर्दा पर, अब टल नहीं सकते हैं
मुमकिन है कि कुछ अरसे, इस जश्न से टल जाये|

ये जश्न मुबारक हो,लेकिन ये सदाकत है,
हम लोग हक़ीकत के एहसास से आरी है |
गाँधी हो, कि ग़ालिब हो , इंसाफ की नज़रों में,
हम दोनों के कातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं|

बचपन से ही, साहिर लुधियानवी की लिखी ये ग़जल, न जाने कितनी बार अपने श्रधेय नाना जी (स्व. रामकृष्ण मणि त्रिपाठी ) के मुह से सुनते सुनते करीब करीब याद हो चली थी...
जिसकी स्मृति समय की गर्द ने धूमिल कर दी थी, मेरे लिए ये ग़जल, सिर्फ एक ग़ज़ल ही नहीं हैं, बल्कि बड़ी ही शिद्दत से, उन सारे अहसासों का एक अहसास हैं, जिनके बीच रहते, जिनका समर्थन करते नानाजी ने अपना जीवन जिया |
इस ग़ज़ल को फिर से पाना, नाना जी के उस अहसाह को फिर से पाना हैं , जो इस ग़ज़ल और इसकी पृष्ठभूमि के साथ, नानाजी से जुड़ी हुई हैं...
धन्यवाद Talat Aziz आंटी और Aziz Ahmad अंकल, जिनकी वजह से मै उन अहसास से पुनः गुजर सका...!


"

" अथ श्री श्री पी. चिदंबरम हवन का भविष्यफल ...

वार्षिक बजट के एक दिन पहले की टीप ;-

(१०० प्रतिशत की गारंटी के साथ )
ऊँ कामगार स्वाहा ऊ किसान स्वाहा ऊँ नौकरीपेशा स्वाहा ऊँ आम आदमी स्वाहा
ऊँ भारत भविष्य स्वाहा, ऊं सारे विरोधी स्वाहा...

ऊँ सोनिया गाँधी आहा ! ॐ राहुल गाँधी आहा ! ॐ प्रियंका बढेरा आहा! ॐ उनके दो बच्चे भी आहा!
ॐ जमाई बाबू आहा ! ॐ कांग्रेस पार्टी आहा!
ॐ देश हो जाये स्वाहा:||

ये हमारे देश के बजट का भविष्य फल हैं...

ख़बरदार इस पी . चिदंबरम हवन का चरणामृत तभी पीजिएगा जब आप में शिव की तरह गरल पीने की क्षमता हो, और कपार में पोछे भी तो भस्म हो जाइयेगा, लिहाजा चरणामृत हाथ में धरे -धरे अगले साल का इंतजार करिये ...||
"

कुछ फेसबुक पर की टिप्पड़िया – (1)

"सहमत होना या असहमत होना...उतनी बड़ी बात नहीं, जितना कि अपनी सहमति या असहमति दर्शाने का तरीका, यह सहमति या असहमति जताने का जो "तरीका" है, न ...वह बड़ा महत्वपूर्ण है|
एक राष्ट्र के लिए, समाज के लिए, व्यक्ति के लिए और इन सबसे जुड़ी विचारधाराओ के लिए भी |

दुर्भाग्य से, मेरे देश के सभी राजनितिक दल और चिन्तक, इस महत्वपूर्ण पहलू की पूर्ण उपेक्षा करते है ...सभी मतलब सभी, बिना किसी अपवाद के !"

लिंक ;- https://www.facebook.com/cakashyap/posts/10200650119837024
"शम्भुनाथ शुक्ल (Shambhunath Shukla) जी का स्टेटस पढ़ते हुए मुझे यकायक अपनी होली याद हो आई...

लखनऊ के अपने फ़िलहाल के मोहल्ले "सरोजिनी नगर सोसायटी कालोनी" में नया हूँ, गिने चुने परिचित है, कुल मिला कर बस दो ...लिहाजा अपरिचित होने की वजह से कोई भी रंग लगाने नहीं आया, दस बजे के करीब अपने भाई के साथ घूमने निकला, हम दोनों लगभग तीन चार किलोमीटर का चक्कर लगा आये, न जाने कितने हुरियारों की टोलिया गुजर गयी...रंग किसी ने नहीं डाला...दो तीन बच्चे अपने घर के बाहर पिचकारी लिए खड़े थे, उन्होंने यू ही बस पिचकारी तान दी, पर रंग नहीं डाला , मै खड़ा हो गया और बोला "जब पिचकारी लिए हो तो रंग डालो" पिचकारी में सिर्फ पानी था...

होली का पानी कहा चला गया दोस्तों, रंगों की बात तो खैर बड़ी दूर है ?

(...देख कबीरा रोया )"

लिंक ;- https://www.facebook.com/cakashyap/posts/10200635333947386
"गोरखपुर और आसपास के इलाके में होली कल मनाई जाएगी...!

एक जोकर एक पूरे इलाके को जोकर बना रहा है, दुर्भाग्य से उसके साथ उन्मादी गुंडों का एक समूह है, जो शरीफ लोगों को चुप रहने को मजबूर कर देते है...

क्या कबीर अपनी कर्मभूमि पर इस "टमाटर" के कहने पर होली एक दिन बाद मनाते ?

(तुम बहुत याद आते हो, कबीर !)"
लिंक ;- https://www.facebook.com/cakashyap/posts/10200598491106338
"बम्बई में 1993 ब्लास्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दस भगोड़ों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया...!

...क्या जो मरे थे, वो जीवित हो उठे है, जो सजा घटाई गयी...???

(वैसे भी हमारे पॉवर इंस्टीट्यूशंश उनका कुछ बिगाड़ तो पायेगे नहीं, और वे पाकिस्तान के ज़माई बने रहेंगे)"

लिंक ;- https://www.facebook.com/cakashyap/posts/10200569470940852
"
बच्चो की तस्करी पर न्यूनतम बीस वर्ष की सजा का प्रस्ताव...
और ...
किसी महिला पर तेजाब फेकने की सजा, आजीवन कारावास...!!!

भला इस प्रस्ताव से किसको आपत्ति हो सकती है...!

है, आपत्ति है...कल संसद में ये दोनों प्रस्ताव ख़ारिज कर दिये गए...

माननीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, औरतो की सुरक्षा के बिल पर बहस के दौरान टिप्पड़ी करते नज़र आये की ;अगर पीछा नहीं करेंगे तो मोहब्बत कैसे होगी...!!!
लिंक ;- https://www.facebook.com/cakashyap/posts/10200558630749854

...निलहा महामंत्री !

बहुत पहले, बहुत बहुत पहले की बात है, एक महामंत्री, अपने रथ से जा रहा था, रास्ते में एक मार्ग प्रदक्षक ने, चौराहे पर उसके रथ को रुकने का इशारा किया, उसने रथ के शीर्ष पर फहरा रहे सूर्य ध्वज की तरफ इशारा करते जानना चाहा, कि क्या माननीय महामंत्री इस सूर्यध्वज को अपने रथ के शीर्ष पर फहराने के लिए अर्ह है ?
महामंत्री को अत्यंत क्रोध आया, उसने त्वरित सज्ञान लेते हुए राजकिय आदेश पारित किया “एक महामंत्री के रथ को कुछ अत्यंत आपवादिक दशाओ को छोड़ कर अन्य किसी दशा में रोका नहीं जा सकता, एक महामंत्री को राह में रोकना अथवा राजकिय सूर्य ध्वज की अर्हता पर प्रश्न करना एक महामंत्री की प्रतिष्ठा का हनन हैं”
बात राजा तक पहुची, राजा ने महामंत्री को बुलवाया और उसे अपने महल के एक कक्ष में बंद कर दिया जहाँ से सामने की खिड़की से एक लकडहारे का घर दीखता था, महामंत्री ने देखा, लकडहारे के घर के ऊपर सूर्य ध्वज फ़हरा रहा है, लोग आते जाते उस ध्वज को देखते है और आगे बढ़ जाते है, दो चार दिन बीतने पर लोग उस ध्वज की तरफ इशारा करते और लकडहारे का मजाक उड़ाते, ऐसा तीन चार दिन और चला, अंतत: लकडहारे ने लोंगो की फब्तियों से परेशान होकर, चुपके से एक रात, वह सूर्य ध्वज अपने कुटिया से उतार फेंका...!
अगली सुबह राजा ने महामंत्री को दरबार में बुलाया और एक वाक्य का अपना फैसला सुनाया “एक महामंत्री की प्रतिष्ठा उसके कार्य से होती है, न कि राजकिय सूर्य ध्वज से, एक अप्रतिष्ठित व्यक्ति अपने रथ पर सूर्य ध्वज लगा भी ले, तो अनजाने लोंगों में भले क्षण भर को प्रतिष्ठा पा ले, पर जो उन्हें जानते है उनके मध्य वो शेर का स्वांग करता निलहा सियार ही लगेगा”
 

....बात महामंत्री के समझ में तब भी नहीं आयी!

Thursday, April 4, 2013

एक भूखा आदमी बनाम एक नंगी सरकार


       आज एक पुराना, कही पढ़ा वाकया, बड़ी शिद्दत से याद आ रहा है...


”सिमोन द बोउवार” और “सात्र” एक रेस्तरां में खाने बैठे थे...सात्र को देखकर, दरवाजे पर एक आदमी उनके करीब आया और अपने भूखे होने का हवाला देकर उसने सात्र से मदद माँगी, सात्र ने उसे कुछ खाने के लिए कह दिया और उसका भुगतान अपने बिल में जोड़ देने को कहा...

इस बात से सिमोन एकदम झुंझला गयी और बड़े तैश में उन्होंने सात्र से पूछा “तुम ये अच्छी तरह जानते हो कि वह एकदम टुच्चा आदमी है और बहुत बड़ा झूठा भी, उसने पहले भी तुमसे पैसे लिए और वापस नहीं किया, पर इसके बाद भी तुम उसकी मदद कर रहे हो !

सात्र ने सिमोन की तरफ एकटक देखते हुए एकदम ख़ामोश आँखों से और बड़ी सी संजीदगी से जबाब दिया ...एक झूठे और बेईमान आदमी की भी, भूख सच्ची होती है ...!

मै केजरीवाल का समर्थक नहीं, कम से कम सौ ऐसे मुद्दे है जिनपे मै केजरीवाल से, उनके सिंग- पूँछ बने लोंगो से और इन् के रवैये से एकदम असहमत हूँ| मै केजरीवाल और उनके दल-बल वाली परिभाषित “आम-आदमी” की परिभाषा से भी एकदम अलहदा भी हूँ|

पर तब भी, पूरी गंभीरता से मै अपनी सरकार के रोमन राजा नीरो वाले रुख की कड़ी आलोचना करता हूँ, यहाँ महत्वपूर्ण यह नहीं कि अरविंद केजरीवाल क्या है और उनकी मांगो को कितनी गंभीरता से लेने की जरुरत है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हमारी यह सरकार क्या है और यह अपने नागरिकों को कितनी गंभीरता से लेती हैं...

एक आदमी पिछले तेरह या चौदह दिन से उपवास पे है और पशुओ का चारा से लेकर गरीब बच्चो का मध्याह भोजन तक खा जाने वाली हमारी सरकार “मिनरल वाटर” का घूँट भरते और “हैजिनिक्ली प्रूव्ड न्युट्रीशियश फ़ूड” को गटकते हुए क्या कभी एक बार भी सोच रही है, कि इस देश का एक आदमी जो मधुमेह से पीड़ित भी है भूखा है...

       एक भूखे को नंगा करने चली हमारी सरकार खुद कितनी नंगी हैं यह भी अब क्या छिपी बात है ...!