फ्रेडरिक नीत्से को मानने वाले कम नहीं जिसका मानना था कि ईश्वर मर चुका है, जबकि नास्तिको के दो वर्ग है, एक का मानना है, ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं, जबकि दूसरा वर्ग यह मानता है कि ईश्वर का कोई प्रमाण नहीं...
कम्युनिस्ट विचारधारा धर्म को अफीम मानती मानती, स्टालिन, माओ और लेनिन के पिछौटे को थामे पहले तो उनकी अनुगामी बनी फिर भक्त बन गयी और सबसे महान व्यक्ति "पूजको" में कब बदल गयी पता ही नहीं चला...!
"अहम् ब्रह्मास्मि" का नारा भी जब तब सुनाई देता ही रहा है, मध्य काल में सरमद के ‘’अनलहक़, अनलहक़…‘ की गवाह दिल्ली की जामा मस्जिद अभी तक मौजूद है, पर बात यही नहीं ख़त्म होती|
महात्मा गाँधी के "भगवान राम" आर एस एस को स्त्रीय लगते लगते नब्बे तक आते आते युद्ध घोष के नायक लगने लगे तो हैम् सैंड विच और पोर्क सौसिज़ के शौक़ीन, शराब प्रेमी और कभी भी नमाज न अदा करने वाले मुहम्मद अली ज़िन्ना एक इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान के झंडाबरदार बन बैठे...
धर्म को पाखंड घोषित करते करते "कांचा इलैया " पोर्क बीफ फ़ूड फेस्टिवल आयोजित करने लगते है और इसे अपनी आजादी से जोड़ देते है, और उनकी यह मुर्खता भरी सनक धर्म के झंडाबरदारों को और अधिक मजबूत करने का काम करती है ...
आम आदमी इन्हें अपना त्राता मानती है, कुछ धर्म विरोध के जननायक का ढोंग करते है तो कुछ धर्म ध्वज वाहक बन जाते है, वास्तव में तो, सब के सब ढोंग करते है, भईया तुम अपनी आस्था अपने पास रखो, मेरी आस्था मेरे साथ रहने दो, न मै तुमपे तंज करू, न तुम हमें देख जीभ बिराओ, हम उतार देब्बे आपन लाउडस्पीकर तू आपन ढोल मजीरा आपन घर मा रखो, हम सड़के पे नुमाज न पढ्बे, तू मंदिर भीतर आपन हनुमान चालीसा पढयो...!
पर भईया, तब मार कुटाई कैसे होईस, झम्मक झम्मा होवे बदे, कछु तो चहबे करी ...
तो पसमानो लगाओ ठेका और दे दो ताल ...लड़ो बिलारिन, बानर आयो, रोट भी खायो, गोड़ो दबवायो
...बेवकूफ बिल्लियों लड़ो लडती रहो, तभी तो बन्दर तुम्हारी रोटी भी खायेगा और तुम्हारा भाग्य विधाता भी बनेगा!!!
और अंत में Himanshu Kumarar की एक टीप ;-
भाई हिंदुओं और मुसलमानों तुम्हें ये जान कर बड़ी निराशा होगी कि मुसलमानों का अल्लाह और हिंदुओं का ईश्वर एक ही है, यहूदियों, ईसाईयों और सिक्खों का खुदा भी वही है |
जाओ अब लड़ो बेवकूफों...!
