आज एक पुराना, कही पढ़ा वाकया, बड़ी शिद्दत से याद आ रहा है...
”सिमोन द बोउवार” और “सात्र”
एक रेस्तरां में खाने बैठे थे...सात्र को देखकर, दरवाजे पर एक आदमी उनके करीब आया और
अपने भूखे होने का हवाला देकर उसने सात्र से मदद माँगी, सात्र ने उसे कुछ खाने के
लिए कह दिया और उसका भुगतान अपने बिल में जोड़ देने को कहा...
इस बात से सिमोन एकदम झुंझला गयी और बड़े तैश में उन्होंने सात्र से पूछा “तुम ये अच्छी तरह जानते हो कि वह एकदम टुच्चा आदमी है और बहुत बड़ा झूठा भी, उसने पहले भी तुमसे पैसे लिए और वापस नहीं किया, पर इसके बाद भी तुम उसकी मदद कर रहे हो !
सात्र ने सिमोन की तरफ एकटक देखते हुए एकदम ख़ामोश आँखों से और बड़ी सी संजीदगी से जबाब दिया ...एक झूठे और बेईमान आदमी की भी, भूख सच्ची होती है ...!
मै केजरीवाल का समर्थक नहीं, कम से कम सौ ऐसे मुद्दे है जिनपे मै केजरीवाल से, उनके सिंग- पूँछ बने लोंगो से और इन् के रवैये से एकदम असहमत हूँ| मै केजरीवाल और उनके दल-बल वाली परिभाषित “आम-आदमी” की परिभाषा से भी एकदम अलहदा भी हूँ|
पर तब भी, पूरी गंभीरता से मै अपनी सरकार के रोमन राजा नीरो वाले रुख की कड़ी आलोचना करता हूँ, यहाँ महत्वपूर्ण यह नहीं कि अरविंद केजरीवाल क्या है और उनकी मांगो को कितनी गंभीरता से लेने की जरुरत है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हमारी यह सरकार क्या है और यह अपने नागरिकों को कितनी गंभीरता से लेती हैं...
एक आदमी पिछले तेरह या चौदह दिन से उपवास पे है और पशुओ का चारा से लेकर गरीब बच्चो का मध्याह भोजन तक खा जाने वाली हमारी सरकार “मिनरल वाटर” का घूँट भरते और “हैजिनिक्ली प्रूव्ड न्युट्रीशियश फ़ूड” को गटकते हुए क्या कभी एक बार भी सोच रही है, कि इस देश का एक आदमी जो मधुमेह से पीड़ित भी है भूखा है...
इस बात से सिमोन एकदम झुंझला गयी और बड़े तैश में उन्होंने सात्र से पूछा “तुम ये अच्छी तरह जानते हो कि वह एकदम टुच्चा आदमी है और बहुत बड़ा झूठा भी, उसने पहले भी तुमसे पैसे लिए और वापस नहीं किया, पर इसके बाद भी तुम उसकी मदद कर रहे हो !
सात्र ने सिमोन की तरफ एकटक देखते हुए एकदम ख़ामोश आँखों से और बड़ी सी संजीदगी से जबाब दिया ...एक झूठे और बेईमान आदमी की भी, भूख सच्ची होती है ...!
मै केजरीवाल का समर्थक नहीं, कम से कम सौ ऐसे मुद्दे है जिनपे मै केजरीवाल से, उनके सिंग- पूँछ बने लोंगो से और इन् के रवैये से एकदम असहमत हूँ| मै केजरीवाल और उनके दल-बल वाली परिभाषित “आम-आदमी” की परिभाषा से भी एकदम अलहदा भी हूँ|
पर तब भी, पूरी गंभीरता से मै अपनी सरकार के रोमन राजा नीरो वाले रुख की कड़ी आलोचना करता हूँ, यहाँ महत्वपूर्ण यह नहीं कि अरविंद केजरीवाल क्या है और उनकी मांगो को कितनी गंभीरता से लेने की जरुरत है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हमारी यह सरकार क्या है और यह अपने नागरिकों को कितनी गंभीरता से लेती हैं...
एक आदमी पिछले तेरह या चौदह दिन से उपवास पे है और पशुओ का चारा से लेकर गरीब बच्चो का मध्याह भोजन तक खा जाने वाली हमारी सरकार “मिनरल वाटर” का घूँट भरते और “हैजिनिक्ली प्रूव्ड न्युट्रीशियश फ़ूड” को गटकते हुए क्या कभी एक बार भी सोच रही है, कि इस देश का एक आदमी जो मधुमेह से पीड़ित भी है भूखा है...

No comments:
Post a Comment