बहुत पहले, बहुत बहुत पहले की बात है, एक महामंत्री, अपने रथ से जा रहा
था, रास्ते में एक मार्ग प्रदक्षक ने, चौराहे पर उसके रथ को रुकने का इशारा
किया, उसने रथ के शीर्ष पर फहरा रहे सूर्य ध्वज की तरफ इशारा करते जानना
चाहा, कि क्या माननीय महामंत्री इस सूर्यध्वज को अपने रथ के शीर्ष पर
फहराने के लिए अर्ह है ?
महामंत्री को अत्यंत क्रोध आया, उसने त्वरित सज्ञान लेते हुए राजकिय आदेश पारित
किया “एक महामंत्री के रथ को कुछ अत्यंत आपवादिक दशाओ को छोड़ कर अन्य किसी
दशा में रोका नहीं जा सकता, एक महामंत्री को राह में रोकना अथवा राजकिय
सूर्य ध्वज की अर्हता पर प्रश्न करना एक महामंत्री की प्रतिष्ठा का हनन
हैं”
बात राजा तक पहुची, राजा ने महामंत्री को बुलवाया और उसे अपने
महल के एक कक्ष में बंद कर दिया जहाँ से सामने की खिड़की से एक लकडहारे का
घर दीखता था, महामंत्री ने देखा, लकडहारे के घर के ऊपर सूर्य ध्वज फ़हरा रहा
है, लोग आते जाते उस ध्वज को देखते है और आगे बढ़ जाते है, दो चार दिन
बीतने पर लोग उस ध्वज की तरफ इशारा करते और लकडहारे का मजाक उड़ाते, ऐसा तीन
चार दिन और चला, अंतत: लकडहारे ने लोंगो की फब्तियों से परेशान होकर,
चुपके से एक रात, वह सूर्य ध्वज अपने कुटिया से उतार फेंका...!
अगली
सुबह राजा ने महामंत्री को दरबार में बुलाया और एक वाक्य का अपना फैसला
सुनाया “एक महामंत्री की प्रतिष्ठा उसके कार्य से होती है, न कि राजकिय
सूर्य ध्वज से, एक अप्रतिष्ठित व्यक्ति अपने रथ पर सूर्य ध्वज लगा भी ले,
तो अनजाने लोंगों में भले क्षण भर को प्रतिष्ठा पा ले, पर जो उन्हें जानते
है उनके मध्य वो शेर का स्वांग करता निलहा सियार ही लगेगा”
....बात महामंत्री के समझ में तब भी नहीं आयी!
महामंत्री को अत्यंत क्रोध आया, उसने त्वरित सज्ञान लेते हुए राजकिय आदेश पारित किया “एक महामंत्री के रथ को कुछ अत्यंत आपवादिक दशाओ को छोड़ कर अन्य किसी दशा में रोका नहीं जा सकता, एक महामंत्री को राह में रोकना अथवा राजकिय सूर्य ध्वज की अर्हता पर प्रश्न करना एक महामंत्री की प्रतिष्ठा का हनन हैं”
बात राजा तक पहुची, राजा ने महामंत्री को बुलवाया और उसे अपने महल के एक कक्ष में बंद कर दिया जहाँ से सामने की खिड़की से एक लकडहारे का घर दीखता था, महामंत्री ने देखा, लकडहारे के घर के ऊपर सूर्य ध्वज फ़हरा रहा है, लोग आते जाते उस ध्वज को देखते है और आगे बढ़ जाते है, दो चार दिन बीतने पर लोग उस ध्वज की तरफ इशारा करते और लकडहारे का मजाक उड़ाते, ऐसा तीन चार दिन और चला, अंतत: लकडहारे ने लोंगो की फब्तियों से परेशान होकर, चुपके से एक रात, वह सूर्य ध्वज अपने कुटिया से उतार फेंका...!
अगली सुबह राजा ने महामंत्री को दरबार में बुलाया और एक वाक्य का अपना फैसला सुनाया “एक महामंत्री की प्रतिष्ठा उसके कार्य से होती है, न कि राजकिय सूर्य ध्वज से, एक अप्रतिष्ठित व्यक्ति अपने रथ पर सूर्य ध्वज लगा भी ले, तो अनजाने लोंगों में भले क्षण भर को प्रतिष्ठा पा ले, पर जो उन्हें जानते है उनके मध्य वो शेर का स्वांग करता निलहा सियार ही लगेगा”
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