Tuesday, April 9, 2013

साहिर लुधियानवी की लिखी एक ग़जल

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इक्कीस बरस गुजरे आज़ादी-ऐ कामिल को
तब जा के कहीं हमको ग़ालिब का ख्याल आया |
तुरबत कहा है उसकी, मसकन था कहाँ उसका,
अब अपने सुखन परवर ज़हनो में सवाल आया |

सौ साल से ये तुरबत चादर को तरसती थी,
आज इसपे अकीदत के फूलों की नुमाविश है |
उर्दू के ताल्लुक से ये भेद नहीं खुलता,
ये जश्न, ये हंगामा, खिदमत है की साजिश है|

जिन शहरों में गूंजी थी, ग़ालिब की नवा बरसो,
उन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ-निशां ठहरी|
आज़ादी-ऐ -कामिल का ऐलान हुआ जिस दिन,
मातूब जुबाँ ठहरी, ग़द्दार जुबां ठहरी |

जिस अहद-ऐ-सियासत ने ये जिंदा जुबाँ कुचली ,
उस अहद -ऐ - सियासत को,महरूमों का ग़म क्यूँ है?
ग़ालिब जिसे कहते हो, उर्दू ही का शायर था ,
उर्दू पे सितम ढा के, ग़ालिब पे करम क्यूँ हैं ?

ये जश्न ये हंगामे दिलचस्प खिलौने हैं
कुछ लोंगो की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाये|
जो वादा-ऐ-फर्दा पर, अब टल नहीं सकते हैं
मुमकिन है कि कुछ अरसे, इस जश्न से टल जाये|

ये जश्न मुबारक हो,लेकिन ये सदाकत है,
हम लोग हक़ीकत के एहसास से आरी है |
गाँधी हो, कि ग़ालिब हो , इंसाफ की नज़रों में,
हम दोनों के कातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं|

बचपन से ही, साहिर लुधियानवी की लिखी ये ग़जल, न जाने कितनी बार अपने श्रधेय नाना जी (स्व. रामकृष्ण मणि त्रिपाठी ) के मुह से सुनते सुनते करीब करीब याद हो चली थी...
जिसकी स्मृति समय की गर्द ने धूमिल कर दी थी, मेरे लिए ये ग़जल, सिर्फ एक ग़ज़ल ही नहीं हैं, बल्कि बड़ी ही शिद्दत से, उन सारे अहसासों का एक अहसास हैं, जिनके बीच रहते, जिनका समर्थन करते नानाजी ने अपना जीवन जिया |
इस ग़ज़ल को फिर से पाना, नाना जी के उस अहसाह को फिर से पाना हैं , जो इस ग़ज़ल और इसकी पृष्ठभूमि के साथ, नानाजी से जुड़ी हुई हैं...
धन्यवाद Talat Aziz आंटी और Aziz Ahmad अंकल, जिनकी वजह से मै उन अहसास से पुनः गुजर सका...!


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