Thursday, May 30, 2013

गाँधी दर्शन ;- साथ होने का अर्थ, हमेशा ही साथ देना नहीं होत !

एक भाई श्री Abhijit Deshmane, जो पूना के निवासी है, उन्होंने एक बड़ा उपयुक्त सवाल पूछा, वो सवाल और उसका जबाब दे रहा हूँ ...
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Abhijit Deshmane =आज अगर गांधी जिवित होते तो वो किस के पक्ष्‍ा में होते नक्सलवादी के साथ या सरकार के साथ ?
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गाँधी सही बात के साथ होते, गांधी न्याय के साथ होते, मानवता के साथ होते, तो जहा आदिवासी सही है, वहा आदिवासियों के साथ होते और जहा सरकार सही है, वहा सरकार के साथ होते, गाँधी के लिए साथ होने का अर्थ, हमेशा ही साथ देना नहीं होता था, एक सच्चा हमदर्द गलत होने पर विरोध भी करता है, तो गाँधी का साथ गुण-दोष के आधार पर होता था, और साधन के साथ -साथ साध्य की पवित्रता उनके लिए आवश्यक थी...

आज के दौर में गाँधी होते, तो वो अपने चेहरे छुपाये बस्तर के जंगलो में हथियार इकठ्ठा कर, अगली हिंसा की तैयारी करने की बजाय "न मानेगे - न मारेगे" का नारा देकर, बस्तर में ही बैठ जाते, आदिवासियों को ग्राम-स्वराज्य के मानी बताते, उन्हें आत्म-निर्भर बनने के तरीके सिखाते, वो समझाते सरकार तुम्हारी दुश्मन नहीं, गलत नीतिया तुम्हारी दुश्मन है, सरकारे बदलती रहती है, पर शासन नीतियों से चलता है, लिहाजा नीतिया बदलने को संघर्ष करो, गाँधी गाव-गाव में पाठशाला खोलते कि बच्चे पढ़े, स्कूलों को डायनामाईट से नहीं उड़ा देते |

वो गाव वालो को कहते, इन अधिकारियो का सम्मान करो, ये तुम्हारी सरकारों की नुमाइंदगी करते है पर इनके जन-विरोधी काम करने पर इनकी अवज्ञा करो, सो जाओ सड़को पर, जिनसे तुम्हारे जर-जंगल-जमीन को नष्ट करने के इरादे से इनकी गाड़िया जाए | बन जाओ अपने जंगल के पहरेदार | वो वही डेरा डाल देते, खेतिया करवाते, पशु पलवाते, गाधी "समृधि और सद्बुद्धि" दोनों की बात करते | आन्दोलन के दौरान, बरसती लाठियों की पहली लाठी, गाँधी पर गिरती पर लाठी चार्ज के बाद, घायलों की सेवा-श्रुष्णा करने को साथ चलता चिकित्सा दल, गाँधी की मरहम पट्टी सबसे बाद में करता और इस मरहम पट्टी के दौरान "आन्दोलनकारी और लाठी बरसाने वाली पुलिस " दोनो की मरहम पट्टी होती|

गाँधी, प्रतिरोध के हथियार हिंसा का समर्थन करने वालो को बुरी तरह फटकारते, साथ ही सरकारी हिंसा पर, हर स्तर पर इसकी अवज्ञा करने को कहते, देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले सुभाष बोस के भारत पर बर्मा के रास्ते कूच करने और आजाद हिन्द फ़ौज के जीतते हुए भारत के नार्थ-इस्ट राज्यों को अंग्रेजो से मुक्त करा लेने के बाद भी, गाँधी ने सुभाष बोस का विरोध किया था, ठीक वैसा ही विरोध गाँधी जी हिंसा का रास्ता अपनाये और दिखा रहे नक्सलियों का करते पर समर्थन सरकार का भी नहीं करते, सत्य वैसे भी अक्सर अकेला ही होता है |

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नक्सल हमले का एक स्याह पहलू, यह भी...

ये आदिवासियों का सरकार के विरुद्ध दिखया गया आक्रोश नहीं है, ये देश की जनता को भरमाने के लिए पहनाये परांदे है| देश की जनता के आक्रोश को रंग भरने को चीनी हथियारो की खेप पे खेप नजर नहीं आ रही, आपको ? ये एक कुटिल और कमीने फ्यूडल स्टेट चायना, जो तिब्बत और सिक्यांग के नागरिको के अमानवीय दमन और अपने देश के नागरिको पर टैंक चलवाने जैसी अमानवीय हरकत करने में परहेज नहीं करता , का परोक्ष युद्ध है, और माओवादी बने हिन्दुस्तानी उसके आसान मोहरे ...

सेनाओ को कही न कही एक दायरे में रहना होता है , पर नक्सलियों के लिए ऐसा कोई दायरा नहीं | सरकार की तरफ से की गयी हत्या निंदनीय है, तो नक्सलवादियो की तरफ से की गयी हत्या भी निंदनीय है, पर सबसे अजीब मानसिकता तो उनलोगों की है, जो चीन के इस हाथ को देख कर भी अनदेखा कर रहे है, ये ही वो लोग है, जो मासूम आदिवासियों के असली हत्यारे है और उनका चरित्र समझना सबसे जादा जरुरी है|

...चीन अपनी सार्वभौमिकता पर (जो वास्तव में उसकी वास्तविक परिधि से दुगुनी से भी जादा जबरजस्ती उसने बना रखी है ) उठी अंगुली के आदमी का सर ही काट देता है, जो उसके कब्जाए प्रान्तों और उसके अपने प्रान्तों के नागरिक भी है, तो राष्ट्र की अवधारणा को मूर्खतापूर्ण मानने वाले हमारे देश के विश्व-नागरिको की मदद कर वो सिर्फ अपने चारे का इंतजाम कर रहा है, चीन को भी पता है, जो अपने देश का नहीं हुआ, वो एक दुसरे देश चीन का क्या होगा, और लोगों से निपटने के तरीके भारत सरकार से जादा "चीनी जनवादी गणतंत्र" को पता है !

आदिवासियों के साथ, सिर्फ माओवादी खड़े है, का तर्क खोखला है, क्योकि माओवादी आदिवासियों के साथ खड़े हो न हो, भारत के विरुद्ध और चीन के साथ जरुर खड़े है |

अगर यह निरपराध आदिवासियों पे बर्बर अत्याचार का बदला है, तो इस तर्क पर भी सिर्फ हँसी आती है, एक निरपराध का बदला दुसरे निरपराध से, बाबर का बदला जुम्मन से, ये तो कोई तर्क नहीं है, भाई !

आज का चीन एक फ्यूडल स्टेट है, और उसे विचार के नाम पर लोगो को मुर्ख बनाना, ख़ूब आता है !!!

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कैसे गुजारेगी हमारी मन्नू !!!

लड़के वालों की तरफ से कोई मांग नहीं हुई, लड़का सुन्दर, सुशील, कमाऊ था|
परिवार भी हर तरीके से अच्छा था, उन्होंने ना तो बारात और बारातियों का खयाल रखने जैसी कोई बात की, ना ही पिछले दरवाजे से लेन-देन किया ...|
बारात आयी, लड़की वालो की आपत्ति थी, बिना आतिशबाजी के कही बारात होती है ?
ऐसा लग रहा है, किसी छोटे-मोटे आदमी की बेटी की शादी है ...!!!
भसुर "ताग-पात डालने के लिए आये, गहना हल्का है, असली नहीं लग रहा (तनिष्क का ब्रांडेड गहना था), ऐसी साड़ी ताग-पात डालने में ? इससे अच्छी तो हम नाउन को सेनुर बहोरायी देते है !!!
शादी चल रही थी, वर पक्ष शालीनता से बैठा था, और वधु पक्ष के उलाहने चल रहे थे ;- ये सब शादी करने आये है, या मातम मनाने ? इससे जादा लोग और हो हल्ला तो हमारे यहाँ सत्य नारायण की पूजा में हो जाता है !
डाल चढ़ा ! वधु पक्ष में जैसे भूकंप आ गया !!! बस इतने ही गहने ? ये तो नकली लग रहे है ? और कितनी सटरहिया साड़ीया है, सब फटीचर है, अपनी तो कोई इज्जत ही नहीं, हमारी इज्जत भी नीलाम कर दिए, लड़की की बुआ और मौसी चिल्लाये जा रही थी, माँ और चाची भी उनके साथ-साथ भुनभुनाती दिखी ||
शादी संपन्न हुई !!! लड़का कुर्सी ले कर किनारे बैठा | ससुर मथ-ढकाई के लिए आये, मांग-टीका और साड़ी के साथ, मथ ढकाई चल ही रही थी, कि वधू पक्ष की औरतों का विलाप शुरू "कैसे फटीचर है सब, कैसे गुजारेगी हमारी मन्नू ! वहा "
ससुर ने प्रतिवाद किया, और जिसके नतीजे सारी औरतो का आक्रोश फूट पड़ा ...
ससुर ने नाराजगी दिखाई, "ये भी कोई तरीका है, शुरू से ही आप लोग अपमानित कर रहे है, हम शादी के लिए आपके दरवाजे पर नहीं गए थे, आप ने सारा -देखभाल के शादी की और इस तरह की बदतमीजी और अपमान के लिए हम नहीं आये |
...लड़की के भीतर की लक्ष्मी-बाई जाग गयी, उसने अपने ससुर को "ख़बरदार अंकल, मेरी बुआ से तमीज से बात करिए" कहते हुए डपट दिया !!!
हुआ हौ-हौ , कच कच सलीके से , लड़की वाले हर तरीके से भारी थे, लड़के वाले तीन का तेईस सुने और अपना स मुह लेकर रह गए !
... ... ... पर शुरू से चुप लड़का एकाएक बोल पड़ा "मै ये शादी नहीं करूँगा !!!"
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ये घटना किन्ही दो शादियों का कोलाज है, जहा प्रत्यक्ष तौर पर मै मौजूद था, लड़के वाले बिना विदाई के गए, ख़ूब पंचायत चली...अंत क्या रहा यह नहीं बताउगा पर आगे पढ़े ...
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... लड़का अड़ गया, नहीं तो नहीं ! पंचायत हुई, पुलिस आयी , सबने लड़के पर दबाव बनाया, नहीं तुम्हारे कहने से कैसे हो जायेगा कि "मै ये शादी नहीं करूँगा" अब कोई भी लड़के को सही नहीं कह रहा था, सबकी कोशिश लीपापोती की थी, कोई लड़की आगे नहीं आयी "तुमने एक दम ठीक किया, मै शादी करुँगी तुमसे", वो लडकियों के नजर में खलनायक है, और दहेज़ से जुड़ी धाराओ का अभियुक्त भी, उसके समर्थन में कोई नहीं है, न कोई नातेदार, न रिश्तेदार | सबका कहना है, वो कुल कलंक है , एक लड़की का जीवन उसने बर्बाद कर दिया ...!!!
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ठीक यही काम टीवी पर देश भर की लाडली बनी एक बिटिया ने भी किया था ...???
(अनजानी राहों का अकेला मुसाफ़िर )
—                             कश्यपकिशोरमिश्रा
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क्रिकेट में ब्राह्मणवाद ...!

एक थे, स्वयंभू मनु वो जब क्रीज में उतरते थे , तो गेंदबाज गेंद खुद सीमा रेखा के पार फ़ेक देते थे, मनु पहले ज्ञात ब्राह्मण क्रिकेटर थे, परशुराम भी क्रिकेट अच्छी खेलते थे, पर उनके आश्रम की टीम, रजवाड़ो की टीम से बुरी तरह हार गयी, इससे कुपित परशुराम ने न सिर्फ क्षत्रियो के प्रति दुर्भावना पाल ली, बल्कि क्षत्रिय राजाओ को इक्कीस बार, युद्ध में पराजित किया |

विश्वामित्र गेंदबाजी बहुत बहुत और बहुत अच्छी करते थे, उनके सामने वशिष्ठ का एक ओवर भी टिकना कठिन हो जाता था, तब एक ओवर में आठ गेंदे फेकी भी जाती थी, लिहाजा वशिष्ठ ने युक्ति से काम लिया, उन्हें पता था विश्वामित्र उग्र स्वभाव के है, लिहाजा वो जब गेंददाजी के लिए आते, तो वशिष्ठ अपने धोती का पिछौटा  ढ़ीला कर देते, और जब विश्वामित्र की दौड़ पूरी हो जाती, तो गेंद फेकने के ठीक पहले, अपनी धोती ठीक करने के बहाने, वशिष्ठ उन्हें रोक देते, लिहाजा कुपित विश्वामित्र के मुह से अपशब्द निकल जाते और इस वजह से उनपर प्रतिबन्ध लग जाया करता | ऐसा विश्वामित्र के साथ इतनी बार हुआ कि वो क्रिकेटरों के ग्रैंड क्लब के सदस्य कभी नहीं बन पाए |

क्रिकेट में स्लेजिंग की शुरुआत भी, विश्वामित्र से ही मानी जाती है ...


दुर्वाषा अत्यंत क्रोधी क्रिकेटर थे, भद्र-पुरुषों के इस खेल में शरीर को निशाना बना आक्रमण करने की शुरुआत दुर्वाषा की मानी जा सकती है, उनकी बाडी-लाइन गेंदबाजी का शिकार एकेडमी की एक उदयमान बालिका क्रिकेटर शकुंतला हुई | नेट पर प्रेक्टिस के दौरान दुर्वाषा ने शकुन्तला के शरीर को लक्ष्य कर ऐसी गेन्दाजी की, कि शकुन्तला के मन में बल्लेबाजी करने के नाम से ही भय बैठ गया, लिहाजा वो शर्म से छुप गयी, उसके प्रेमी महान क्रिकेटर दुष्यंत उसे भूल गए, पर शकुन्तला के पुत्र भरत ने दुर्वाषा के बाडी लाईन गेन्दाजी का मुहतोड़ जबाब दिया और सिर्फ सत्रह गेंदों में अपना शतक पूरा किया जिसमे ग्यारह गेंदे दुर्वाषा ने डाली थी, भरत के इस पराक्रमी प्रदर्शन में, दुष्यंत ने अपनी अतीत की प्रेमिका शकुन्तला की धाकड़ बल्लेबाजी की झलक देखी और बरसो से भूल चूकी अपनी प्रेमिका की उन्हें सहसा याद हो आयी |

बाद में आग्ल क्रिकेटर डगलस जार्डिन भी,
दुर्वाषा के ही नक़्शे कदम पे चला |

द्रोण एक अत्यंत श्रेष्ठ कोच थे, पर उन्होंने अपने एकेडमी के खिलाड़ी को टीम में बनाये रखने के लिए, एकलव्य का अंगूठा कटवा लिया, जिससे वो गेंददाजी में असमर्थ हो जाये, महाभारत स्टेडियम में पांड्वो और कौरवों के बीच उस काल का विश्वकप हुआ था, जिसमे उस काल के करीब सभी महान ब्राह्मण क्रिकेटरों ने भाग लिया था |

क्रिकेट में ब्राह्मणवाद की किताब का परिशिष्ट (एक )
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सन्दर्भ;- Shambhunath Shukla सर की टीप :-
देश के जाने माने इतिहासकार और वरिष्ठ पत्रकार रामचंद्र गुहा ने क्रिकेट को ब्राह्मणों का खेल कहा है। एक जमाने में तो इसमें ब्राह्मणों के सिवाय सभी का प्रवेश वर्जित था। मुसलमानों को छूट थी क्योंकि मुसलमान और ब्राह्मणों के फ्यूडल हित एक दूसरे की पूर्ति में सहायक होते हैं। लगता है कि ब्राह्मणवाद के पतन के साथ-साथ इस खेल को भी अब गर्त में जाना होगा।
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मजदूर दिवस और मजदूर औरते ...!


सिमोन द बोउवार की किताब है "द सेकेण्ड सेक्स" काफी पहले लिखी यह किताब पहली बार अपने विद्यार्थी जीवन के दौरान पढ़ते हुए, कुछ उग्र सी लगी थी, पर गलत कुछ नहीं लगा, सिमोन से सहमत मै तब भी था, और अब भी हूँ...
मजदूर दिवस ने बड़े रंग बदले है, यूरोपियन मूर्तिपूजको के त्यौहार से वर्तमान अन्तर्रष्ट्रीय मजदूर दिवस तक...पर मजदूरो की हमारी कल्पना में हमेशा श्रमिक एक "मर्द या मजदूर" ही होता है, जबकि आमतौर पर हरेक मजदूर अपने घर में एक "बंधुआ मजदूरनी " पालता है...!
हमारे समाज में, औरत का हरेक चेहरा;- माँ, बहन, बेटी , पत्नी , प्रेमिका , भोग्या;- कही न कही सेवा अर्पित करते मजदूर का ही चेहरा है ...
ऐसे में दो खबरे , जो इस आधी आबादी के परवाज को हौसला देती है;-
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पहली;- बांग्लादेश के इतिहास में पहली बार किसी महिला को संसद के स्पीकर के रूप में चुना गया है, शिरीन शरमीन चौधरी को बांग्लादेश की सत्तारूढ पार्टी आवामी लीग ने एकमत से बतौर स्पीकर चुना।
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...और दूसरी बहन Sudha Arora के स्टेटस से ;- मुंबई के इमामबाड़ा इलाके में स्थित 152 साल पुरानी मुगल मस्जिद के मुख्य हॉल के दरवाज़े पहली बार औरतों के लिये बृहस्पतिवार की दोपहर को खोल दिये जायेंगे . अब तक वहां सिर्फ पुरुष इबादत के लिये जाते थे और औरतों की जगह मुख्य हॉल से सटे बंद गलियारों में थी.
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वैष्णव जन !!!

संस्कृत के प्रकांड विद्वान "पण्डित उमादत्त मिश्र" मेरे पितामह के प्रपितामह थे, उनके पुत्र पण्डित महावीर मिश्र अठ्ठारह सौ सत्तावन की ग़दर में "परसिया मिश्र" गाँव के बाकी बागियों के साथ चिन्हित किए गए थे और गोरी "टामी फ़ौज" ने पूरे गाँव पर लगाये जुर्माने को अदा न करने पर समूचे परसिया और मदरिया गाँव को लूट लिया था, उनकी लूटमार का सामना करने को गाँव में सिर्फ औरते और बच्चे बचे थे...

...वे औरते गुलाम हिन्दुस्तानियों की थी, और हाँ, वे औरते मेरे परिवार की बहू और बेटिया थी!

मेरे परदादा "पण्डित बटोही मिश्र" और उनके छोटे भाई "पंडित तिलकराज मिश्र" जब पांच और दो वर्ष के बालक मात्र थे, उनके सर से पिता का साया उठ गया... पंडित बटोही मिश्र शतायु हो कर मरे और उनका सम्पूर्ण जीवन एक श्रमिक गृहस्थ का जीवन था, जिसमे गाँव गिराव की चिंता, पास पड़ोस का ख्याल, पनघट की सफाई, डगर की मरम्मत और "एक रोटी किसी जरूरतमंद को भी जरूर" की प्रतिबद्धता भी थी, मेरे दादा पंडित रामनिवास मिश्र गाँव के पहले मैट्रिक थे, और नेशनल इंटर कालेज, बड़हलगंज के पहली मैट्रिक बैच के विद्यार्थी भी थे, वो हमारे खानदान में पहले सरकारी मुलाजिम भी थे, बेहद सरीफ और मृदुभाषी मेरे दादा की "वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर परायी जाने रे" में अत्यंत आस्था थी, उन्हें कभी भी कर्मकांडी होते मैंने नहीं देखा, मेरे पिता "चंद्रमौली मिश्र" एक सामान्य किसान है ...अपने नाम के आगे पंडित लगाते मैंने उन्हें कभी नहीं देखा...!

ये था, मेरी पांच पीढियों का इतिहास, मै अपने को वैष्णव मानता हूँ जिसका अर्थ मेरे लिए भी नरसी मेहता का "वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर परायी जाने रे" है | मुझे कही से नहीं लगता कि मुझे सिर्फ इस वजह से शर्मिंदा होना चाहिए कि मै ब्राह्मण हूँ, और जो सिर्फ इस वजह से की मै ब्राह्मण हूँ, मुझपर प्रश्न चिन्ह उठाते है तो मुझे जरा आश्चर्य होता है...!

...मैंने अपनी दादी स्वर्गीय रमाधारी देवी मिश्रा को चमरौटी में गंदे बीमार बच्चो को अपने सीने से दूध पिलाते देखा है (जी हा सचमुच), हमारा घर पूरे गाँव में चमरौटी से घिरा हुआ है, और जाति आधारित वैमनस्य बोने वाले शायद यकी करे न करे , चमरौटी की औरतो ने मेरी दादी की शवयात्रा रोक दी, उनका अंतिम दर्शन करने के लिए...!

मुझे गर्व है, अपने पुरखो पर, उनकी उस कालयात्रा पर, जिसकी स्मृति से हुई नम आँखों का गवाह मेरा बचपन रहा है, मुझे गर्व है, अपने भीतर बहते खून पर, जिसका संस्कार "पीडक" नहीं, न "आत्म" न "पर" बल्कि वो प्रेम करना जानता है...!

मै कहा गलत हूँ ...?


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Thursday, May 23, 2013

फ़िराक अक्सर बदल कर भेष, फिरता है कोई काफ़िर (...1)

ज़रूरी यह नहीं, कि आप हिंदू है, मुसलमान है, सिख है या इसाई है, और उनमे भी बाभन है, राजपूत है बनिए है दलित है, या शेख है, सैयद है, या अंसारी है, या फिर नामधारी, सरदार या मोना है, या कैथलिक है, प्रोटेस्टेंट है...
सबसे जरुरी बात यह है , की हुकुमन के साथ आपकी गिरह कैसे बंधी है , और बेशक, ये गिरहबंदी आपको एकदम अपने लाईक और माकूल लग रही हो, साथ ही गाँठ एक दम सही बंधी नजर आ रही हो , तब भी आँखों का धोखा खा जाना कोई बड़ी बात नहीं, गो कि गिरह बंधे होने के बाद भी ये जरुरी नहीं, कि इससे आपका फाईदा सध ही जाये, क्यूकि यहाँ एक बड़ा ही अलहदा हिसाब-किताब काम करता है |

इस हिसाब में, एक बड़ा और जियादा जरुरी पेंच यह होता है, कि बेशक गिरह्बंदी के बाद भी, आप हुकूमत के लिए जियादा फाईदामंद कैसे हो सकते है, हुकूमते हमेशा, हमेशा और हमेशा ही सिरफ अपना फ़ाईदा देखती है, और यह तब भी बिलाशक हो रहा होता है, जब हमें ये लग रहा होता है, कि अपनी अवामियत की नुमाइंदगी के बूते, हम हुकूमत अपने इजारे पर चला रहे है, हम अपनी रौ में नारे लगा रहे होते है "जिसकी जित्ती गिनती भारी, उत्ती भारी हिस्सेदारी" हम ख़ुशी ख़ुशी सोच रहे होते है, हुकूमत हमारी ताबेदार है, और इस जम्हूरियत में हमारी गिनती के बिना पर ही इनकी हुकूमत चल रही है, पर यक़ीनन सच्चाई इससे अलहदा होती है |

सोचते रहिये, लगाते रहिये अपने गिनती का हिसाब, आपको पता नहीं सियासत के हिसाब अलग ही होते है, सियासतदानों के वादे भी अलग ही होते है, जनाब ये आपको सस्ते दाम पर बिकने वाला बना कर, वक्ती तौर पर अपना जरखरीद गुलाम बना लेती है, आप उनके झंडो का डंडा बन उन्हें थामे फहराते रहते है, और सियासत चढ़ते चढ़ते हुकूमत में तब्दील हो जाती है |

पर ऐसा नहीं है, कि आपके सियासतदानों के ज़हन से आप का ख़याल उतर गया है, गिनती के लिहाज से आपकी कीमत तो है ही , जनाब लेकिन सियासत खून चढ़ के बोले तो इसके अलग ही मजे है, इसी बहाने कुछ को निपटाया जा सकता है, जो आज़ाद खयाल है| कुछ को हटाया जा सकता है, जो दम-दमे के वक्त कीर्तन करते है| ... और कुछ से छुटकारा पाया जा सकता है, जो जोंक की तरह चिपटे हुए है (अपना फाईदा सोचते है, नामुराद!)|

हुकूमत अपने अलावा किसी की नहीं होती, और बस अपना फ़ायदा देखती है, लिहाजा सारी गिरह्बंदी के बाद भी, अगर अपने फायदे के लिए, आप की लाश पर सियासत की जा सकती है, तो आप कित्ते भी हमनवाज हो जनाब ...आप तो कटेंगे ही, आप पर कोई रहम नहीं है ...
बकरे की जाति थोड़े होती है मियाँ, उसके बस गर्दन होती है, जो हर हाल में कटती है |
============================================== कश्यप किशोर मिश्रा
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हुए तुम दोस्त जिनके, उसका दुश्मन हवा क्यों हो ?

औरत, औरत ही होती है, चाहे वो बाजारू, “धंधे-वाली” हो अथवा हमारे-आपके घर की घरेलू औरतें | एक औरत होने की वजह से, एक औरत को मिलने वाले, सम्मान का हक़दार दोनो औरते होंगी | लेकिन अगर एक धंधे-वाली औरत राह चलते अपने भद्दे-इशारे इशारे और भाव-भंगिमा दिखाती चले, तथा बोलने का मौका मिलते ही अपनी गलियों वाली अश्लील टिप्पड़ियो के साथ बात करते हुए, अपने लिए सारी मर्यादाओ को ताक पर रख दे, तो वहा स्थिति क्या होगी?

क्या घरेलू औरतें, उनके हाथ नचा कर, भद्दे इशारे के साथ यह पूछने पर कि “क्या रे, क्या बात करती तू, तू भी औरत-मै भी औरत, क्या अंतर, तेरे में –मेरे में ? इसका सही जबाब दें पायेगी ? इसका सही जबाब उस दूसरी घरेलू औरत के पास नहीं, बाजारू औरत की, अगर कोई इस धंधे से दूर बेटी है, उसके पास होगा, पर वहा यह सवाल पूछने का बाजारू औरत के पास साहस नहीं होगा |

औरत दोनो है, एक औरत के नाते उसे उसका मिलते वाला ‘नारियोचित” सम्मान मिलना ही चाहिए, पर जैसे ही, वह अपने लटके –झटके, अश्लील इशारे और भद्दी जुबान का इश्तेमाल करना शुरू करती है, वह अपने आप को औरत से एक “बिकने को तैयार वस्तु” ( saleable stock or commodity) बना देती है और ऐसा करते ही वह नारी की गरिमा पर चोट करती है|

इसके बाद भी, अगर एक घरेलू औरत यह कहती है, मेरे लिए हरेक औरत, सिर्फ औरत है और इसके जबाब में बाजारू औरत ये कहे, तो चल अपना घर खाली कर वहा मै बैठती, तू चल कोठे में बैठ | आज से मेरा नाम “घरेलू औरत और तेरा बाजारू औरत” तो क्या कोई अंतर आ जायेगा, बाजारू औरत घर को कोठे में तब्दील कर देगी और घरेलू औरत कोठा भी घर में बदल देगी और सौ-पचास साल बाद “घरेलू औरत” का मतलब लोग धंधा करने वाली, जबकि “बाजारू औरत” का मतलब इससे इतर औरत का लगायेगे |

उपरोक्त उदाहरण, मात्र, एक स्थिति स्पष्ट करने के लिए दिया गया है, और इसका कतई भी आशय, अपनी उन बहनों की स्थिति अथवा उनके चरित्र पर प्रश्न चिन्ह लगाना नहीं है, जो अपनी किसी भी मजबूरी की वजह से इस तरह के नारकीय जीवन को जी रही है, यहाँ आशय सिर्फ “इशारे-भाषा-भंगिमाओ और मानसिकता” का है |

एक व्यक्ति के व्यक्तित्व में उसकी मानसिकता का बहुत बड़ा हाथ होता है, मेरे दो मित्र (समर अनार्य और अनिल कुमार) हालाकि दोनो कम्युनिस्ट है (अपने अपने दावे से ) पर अनिल भाई की और समर भाई की आपस के कुछ मतभेद है| मै कम्युनिस्ट नहीं हूँ, पर अनिल भाई की एक सार्वजनिक पोस्ट की एक टिप्पड़ी पर, मैंने अपनी आपत्ति जताई, निश्चित ही अनिल भाई का व्यवहार और प्रतिक्रिया शालीन रही, और मै अनिल भाई को अपनी मित्र-सूचि में देखकर खुश हूँ, पर हमारे वार्ता में कुछ अन्य सज्जन भी कूद पड़े, शुरू से अंत तक मेरी शालीनता और शब्दों पर नियंत्रण कायम रहा, पर एक सज्जन “अशोक दुषाध” महोदय अपने उजबक तर्कों के साथ हाजिर “जो भी ब्राह्मण वो ब्राह्मणवादी” एक दुसरे सज्जन आलोक रंजन महोदय भी अवतरित हो आये | इन आलोक रंजन महोदय ने मुझे “चोर” बना दिया और अशोक दुषाध महोदय ने “चमचा”|

कम्युनिष्ट होने का दावा करने वाले हमारे ये भाई, अपने “दलित” होने और इसकी बिना पर या तो “लुटने” की बात करते है (मंटो की कहानी, कम्युनिज्म, यहाँ लूटमार –डकैती के इसी तरह के सन्दर्भ में है) या “तुम हटो अब हमें गद्दी दो” कह कर भीख मागते लगते है (पूरी वार्ता नीचे टिप्पड़ियो में पेस्ट कर रहा हूँ), बात करने के क्या इसी सलीके से, आप अपना, अपने परिवार का और अपने समाज का प्रतिनिधित्व करेगे? और अगर हाँ, तो जनाब आप जैसो के लिए ही फ़िराक (अगर मै सही हूँ) ने कहा था ;- “हुए तुम दोस्त जिनके, उसका दुश्मन हवा क्यों हो ?”

दुश्मनों का सारा काम तो आप ही कर देंगे :)

Ashok DusadhAnil KumarAlok RanjanSamar Anaryaनलिन मिश्राKashyap Kishor Mishra

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डंडे - झंडे की भाषा जानवर भी समझता है |

कोई भी विचारधारा इनती पूर्ण नहीं होती, कि किसी और विचारधारा से सामंजस्य की गुंजाईश ही न बचे और अगर ऐसा है, तो जो विचारधारा विचारो में सामंजस्य और परस्पर सम्मान कायम करने में असफल है, वो सामाजिक समरसता की स्थापना में कतई सहायक नहीं हो सकती |
कोई भी किताब, चाहे वो राजनैतिक मूल्यों से जुड़ी हो या सामाजिक अथवा धार्मिक सरोकारों से, पर जुड़ाव, अंतत समाज से रहता है, और समाज से या सामाजिक सरोकारों से जुड़े विचार हमेशा काल और समाज के सापेक्ष और उसी के अनुरूप गत्यात्मक भी होने चाहिए, काल या समाज से निरपेक्ष कोई भी विचारधारा बदलते समय के अनुशीलन में असमर्थ रहने पर समाज में सिर्फ और सिर्फ सड़ांध भरी दुर्गन्ध पैदा करेगी और स्वस्थ सामाजिक विकास से जुड़े सरोकारों के प्रवाह में बाधा पैदा करेगी |

...किसी भी विचारधारा से जुड़ने की पहली शर्त ही "आलोचना" होनी चाहिए, अगर आपकी विचारधारा आपके दिमाग पर बंदिशे थोपती है और आपको एकांगी बनाती है, इसका अर्थ है एक व्यक्ति के तौर पर यह आपके सम्पूर्ण विकास में बाधक है, और इस तरह की बाधाये, जो भी विचारधारा, समाज के प्राथमिक इकाई के विकास में ही थोप रही हो, उसके जरिये स्वस्थ समाज का सपना देखना, या ऐसी उम्मीद करना बेमानी है और निश्चित ही ऐसी विचारधारा को अस्वीकार कर देना स्वस्थ सामाजिक मूल्यों की स्थापना की प्रक्रिया में अत्यंत आवश्यक है, वैसे भी यह कतई आवश्यक नहीं की सभी विचारधाराए समाज की स्वीकृति प्राप्त ही करे, अथवा अतीत में सामाजिक स्वीकृति प्राप्त, चाहे किसी भी वजह से, विचारधारा को अतीत की स्वीकृति के आधार मात्र पर अपने समाज के लिए हम भी स्वीकार करे| वैसे भी समाज और उससे जुड़े आचार, मूल्य और कायदे कानून गत्यात्मक होने ही चाहिए |

किसी भी विचारधारा से जुड़ने पर उसके मूल के अतिरिक्त अन्य बाते गौड़ होती हैं, वही महत्वपूर्ण भी है, लिहाजा किसी विचारधारा के मूल विचार के अतिरिक्त अन्य विचार व्यक्ति सापेक्ष होने चाहिए, अगर ऐसा है तो आप व्यक्ति के तौर पर एक विचारधारा को लेकर चल रहे है, जिसमे अपने व्यक्तिगत समालोचना से आप आवश्यक परिवर्तन भी कर रहे है, और तब आप सही है, अन्यथा आप विचारधारा नहीं उसके "झंडे-डंडे" को लेकर चल रहे है और उन्ही से शासित हो रहे हैं|
डंडे-झंडे की भाषा तो जानवर  भी समझता है... |
-------------------------------------------------------------------- कश्यप किशोर मिश्र |
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हमारी इलेक्ट्रानिक मीडिया की एक तस्वीर ...!

करीब दो घंटा पहले Lata Shukla और अपने एक विद्यार्थी Vikas Anand से रूबरू था, कि खबर आयी, कि जिस बहुराष्ट्रीय शीतल पेय उत्पादक कम्पनी में मै काम करता हूँ, उसके एक डिपो में आग लग गयी है, लिहाजा तत्काल मै डीपो पंहुचा, आग भयंकर थी और फ़्रिज, डीप फ्रीज़र, आईस बाक्स और एक दम नए आये सोलर फ़्रिज वाला पूरा का पूरा हिस्सा आग के चपेट में था |
इलेक्ट्रानिक मिडिया के लोग डिपो पर भरभरा कर टूटे पड़े थे और रिकार्डिंग कर रहे थे, न्यूज प्लस नामधारी एक समाचार चैनल के एक उत्साही कैमरामैन+रिपोर्टर को बाकी रिपोर्टर के साथ मैंने खतरनाक ढंग से फ़ैल रही आग के क्षेत्र से हटने को कहा, जहा बाकी सारे लोग हट गए, वह जबरदस्ती शूट किये जा रहा था, अन्ततः मुझे उससे कड़ाई से कहना पड़ा, कि उसे अपनी फ़िक्र भले न हो, पर मुझे उसकी फ़िक्र है और वो उस क्षेत्र से तत्काल हट जाये, पर बजाय हटने के वह मुझे बताने लगा "मुझे अपना काम पता है' ये मेरा रोज का काम है" मैंने उसे समझाया पर वह दिक् किये जा रहा था और हटने का नाम नहीं ले रहा था, बातचीत में वह "तुम" का इस्तेमाल कर रहा था और कह रहा था "तुम खबर लेने से हमको रोक लोगे" ऐसे बेहुदे कथित पत्रकारों को ये भी नहीं पता "खबर लेना उनका कर्तव्य है, अधिकार नहीं | वह मेरे जैसे पचासों आये -गए की बात कर रहा था और हटने से इंकार कर रहा था, मेरे लिए उसकी सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा था, और वह मै अपनी सुरक्षा कर लूँगा पर अडा हुआ था और अन्तःतः "नहीं हटूंगा क्या कर लोगे " पर आ गया |
...अंततः मेरा धैर्य जबाब दे गया, मैंने उसके गले पर हाथ लगाया और धक्का दे कर पीछे धकेल दिया, क्रोध में मैंने उससे कहा "तुम्हारे जैसे दो कौड़ी के आदमी की औकात , कैमरा ले लेने से पत्रकार की नहीं हो जाती" मै क्रोध में था और मैंने कहा "चार लाठी लगवाता हूँ, बनाओ एक और ख़बर" मैंने गार्ड्स को आवाज लगायी पर वह शोर-गुल में दब गयी, पर तब-तक उसे ये समझ में आ चूका था कि उसका पाला गलत आदमी से पड़ा है...और उसने कहा "हाथ हटाओ , पहले हाथ हटाओ जा रहा हूँ, न!"
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सारे चैनल वाले बस अलग -अलग कोणों से तस्वीर खीच रहे थे, और फिर पुलिस कप्तान को घेर कर खड़े हो गए "सर एक बाईट" पुलिस कप्तान का दो-तीन वाक्य का बयान, कुछ आती फायर ब्रिगेड की गाडियों को शूट किया, चलो हो गयी रिपोर्टिंग
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... .... क्या समाचार चैनलों के इस तरह के कैमरामैन+रिपोर्टर के लिए शादी की रिकार्डिंग तक सिमित रहना ही बेहतर नहीं है, या हम इन्हें पत्रकार की जगह एक "लाइव -फीड सेंडर" मात्र माने |
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इस्लाम और जिहाद के मानी

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के मूर्धन्य विद्वान स्व. रामकृष्ण मणि त्रिपाठी, आतंकवाद और मुसलमान जैसे किसी विषय पर अपनी बात रख रहे थे, उसकी दो बाते मुझे आज तक याद है;-
पहली जिहाद के मानी ;- जिहाद के मानी किसी का क़त्ल करना नहीं बल्कि अपने मजहब के लिए मर मिटना है...(Zihad has not meant to kill any one, but Zihad means offering yourself to save your religion)
(मर मिटना और मार मिटाना दोनों के मानी एकदम अलग है )
और दूसरी मुसलमान के मानी एक शेर :-
"यह शहादत गहे उल्फत में क़दम रखना है,
लोग समझते है आसां है मुसल्मा होना"

...और मै इसपर खरा उतरे ऐसे कम से कम सौ मुसलमानों को जानता हूँ!
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کشی ہندو ویشوودیلے مے پولیٹیکل سائنس کے بدی جانکار مرحوم رامکرشن منی ترپاٹھی آتنکواد اور مسلمان جیسے کسی مسلے سے مٹالک اپنی بات رکھ رہے تھے ، انکی دو باتیں میرے زہن مے آج تک ہے ؛-
پہلی جہاد کے مانی ؛- جہاد کے منی کسی کا کٹل کرنا نہیں بلکی اپنے مذہب کے لئے مر مٹنا ہے
(مر مٹنا اور مر مٹانا دونو یکدم الحدا بٹن ہے )
اور دوسری مسلمان کے منی ایک شیر کے معرفت ؛
"یہ شہادت گاہے الفت میں قدم رکھنا ہے '
لوگ سمجھتے ہے آسان ہے مسلمان ہونا "

...اور حضرت می اسپر کھڑا اترے سچمچ ایسے سو مسلمانو کو جانتا ہوں

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Friday, May 3, 2013

भाषा बहता नीर है ...|



एक भाषा के लिए, वर्ण (ध्वनि), शब्द और वाक्य संरचना अत्यंत महत्वपूर्ण है| वर्ण अर्थात ध्वनि, हिंदी में ग्यारह स्वर और पैतीस व्यंजन, अर्थान कुल छियालिस वर्ण हैं, पर हिंदी के किसी भी बच्चे के अक्षर ज्ञान की शुरुआत  बारह अथवा तेरह (ऋ को शामिल कर ले तो ) स्वर और छत्तीस व्यंजन अर्थात अड़तीस या उनचालीस वर्ण के अभिज्ञान  से होती है...

भाषा का सफ़र बोलियों और उपभाषा से होते हुए मानक भाषा तक का होता है, भाषा की व्याख्या में कुछ पद अवश्य नज़र आते है, जैसे “मानक, पद्धति और माध्यम” उक्त तीनो शब्द कही न कही एक “सु-व्यवस्थित तंत्र” की आवश्यकता का बोध कराते है|

बेशक एक भाषा की वाक्य संरचना और शब्द का बहुत बड़ा आधार उसकी बोलिया होती है, पर मानक स्थापित हो जाने के बाद बोलियों के शब्द कतई जरुरी नहीं कि मानक भाषा के शब्द माने जाये| अवधी जो हिंदी के भाषिक विकास के चरण की एक महत्वपूर्ण बोली है, उसमे “श” वर्ण का अभाव है, सम्पूर्ण राम-चरित मानस में “श” वर्ण का कही भी इस्तेमाल नहीं हुआ | अवधी में “शिखा”, “सिखा” है , वैसे ही भोजपुरी के वर्ण और शब्द जिन दीर्घ उच्चारण के साथ व्यवहार में लाये जाते है, उन्हें हिंदी में एकदम ही इस्तेमाल नहीं किया जाता |

लिहाजा, बेशक एक भाषा का स्वरुप बोलियों के मार्फ़त तय होता हो, तथापि यह जरुरी नहीं कि उसकी बोलियों के वर्ण, शब्द और वाक्य विन्यास भी मानक भाषा में जस का तस इस्तेमाल किया जाये |

कभी कभी ऐसा भी होता है, कि कोई एक बोली दो भाषाओं के विकास की संगी रही हो | पंजाबी प्रायः हिंदी के प्राथमिक विकास के चरण की एक बोली मानी जाती है और अब खुद भी एक भाषा मानी जाती है, पर पंजाबी लिखी चाहे गुरुमुखी में जाये या शाहमुखी में, इसका वाक्य विन्यास, और शब्द हिंदी से अलग नजर आते है, जिसकी वजह इसका “प्राकृत” से आगे न बढ़ पाना है| अपने विकास के क्रम में हिंदी प्राकृत से काफी आगे बढ़ चुकी है, लेकिन पंजाबी प्राकृत पे ही अटकी हुई है, यही वजह है, कि हिंदी का जितेन्द्र पंजाबी में जीतेंदर और धर्मेन्द्र, धरमेंदर हो जाता है, और पंजाबी का जीतेंदर,धरमेंदर हिंदी में जितेन्द्र, धर्मेन्द्र हो जाता है|

कई बार भाषा रूपी बहता नीर, जब बरसाती नदी की तरह किसी एक बोली या अन्य भाषा से शब्दों का बेतरह आयात कर रहा होता है, तो उसमे कुछ दिलचस्प बदलाव भी होते है, देवनागरी वर्ण में नुक्ते का इस्तेमाल और  अंग्रेजी के कुछ शब्दों की “ऑ” ध्वनि दर्शाने के लिए “बिंदु रहित चन्द्र” का इस्तेमाल इसका एक बेहतर उदाहरण है| पर ये बदलाव और शब्दों का आयात कई बार भाषा के “शब्द विचार” और “वाक्य विचार” को चुनौती देते नजर आते हैं, हिंदी में अत्यंत प्रचलित “अंतर्देशीय” और “असावधान” जैसे शब्द इसका सटीक उदाहरण है, लाख कि ये शब्द हिंदी में इस्तेमाल हो रहे हो, पर जिन अर्थो में इस्तेमाल हो रहे है, वे गलत है, “अन्तःदेशिय” और “अनावधान” सही शब्द है और प्रचलन मात्र में होने से गलत शब्द सही नहीं माना जा सकता अगर वह मानक भाषा के व्यवस्था के प्रतिकूल हो| ठीक ऐसा ही, वाक्य विधान की कुछ प्रचलित विधिया, मसलन “मेरे को नहीं मालूम”, “तूने जाना हो तो बता” आदि सिर्फ प्रचलन में होने से ही हिंदी का अंग नहीं मान ली जनि चाहिए|

वैसे भी बोली जाने वाली और लिखी जाने वाली भाषा अलग अलग ही होती है|

भाषा एक बहता नीर है, इसकी शुचिता महत्वपूर्ण है, बेशक तमामो तमाम तरह की धाराए-उपधाराए आ कर इसमें मिलती है, पर एक नदी को भी सफाई की जरुरत होती ही है |