एक भाई श्री Abhijit Deshmane, जो पूना के निवासी है, उन्होंने एक बड़ा उपयुक्त सवाल पूछा, वो सवाल और उसका जबाब दे रहा हूँ ...
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Abhijit Deshmane =आज अगर गांधी जिवित होते तो वो किस के पक्ष्ा में होते नक्सलवादी के साथ या सरकार के साथ ?
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गाँधी सही बात के साथ होते, गांधी न्याय के साथ होते, मानवता के साथ होते, तो जहा आदिवासी सही है, वहा आदिवासियों के साथ होते और जहा सरकार सही है, वहा सरकार के साथ होते, गाँधी के लिए साथ होने का अर्थ, हमेशा ही साथ देना नहीं होता था, एक सच्चा हमदर्द गलत होने पर विरोध भी करता है, तो गाँधी का साथ गुण-दोष के आधार पर होता था, और साधन के साथ -साथ साध्य की पवित्रता उनके लिए आवश्यक थी...
आज के दौर में गाँधी होते, तो वो अपने चेहरे छुपाये बस्तर के जंगलो में हथियार इकठ्ठा कर, अगली हिंसा की तैयारी करने की बजाय "न मानेगे - न मारेगे" का नारा देकर, बस्तर में ही बैठ जाते, आदिवासियों को ग्राम-स्वराज्य के मानी बताते, उन्हें आत्म-निर्भर बनने के तरीके सिखाते, वो समझाते सरकार तुम्हारी दुश्मन नहीं, गलत नीतिया तुम्हारी दुश्मन है, सरकारे बदलती रहती है, पर शासन नीतियों से चलता है, लिहाजा नीतिया बदलने को संघर्ष करो, गाँधी गाव-गाव में पाठशाला खोलते कि बच्चे पढ़े, स्कूलों को डायनामाईट से नहीं उड़ा देते |
वो गाव वालो को कहते, इन अधिकारियो का सम्मान करो, ये तुम्हारी सरकारों की नुमाइंदगी करते है पर इनके जन-विरोधी काम करने पर इनकी अवज्ञा करो, सो जाओ सड़को पर, जिनसे तुम्हारे जर-जंगल-जमीन को नष्ट करने के इरादे से इनकी गाड़िया जाए | बन जाओ अपने जंगल के पहरेदार | वो वही डेरा डाल देते, खेतिया करवाते, पशु पलवाते, गाधी "समृधि और सद्बुद्धि" दोनों की बात करते | आन्दोलन के दौरान, बरसती लाठियों की पहली लाठी, गाँधी पर गिरती पर लाठी चार्ज के बाद, घायलों की सेवा-श्रुष्णा करने को साथ चलता चिकित्सा दल, गाँधी की मरहम पट्टी सबसे बाद में करता और इस मरहम पट्टी के दौरान "आन्दोलनकारी और लाठी बरसाने वाली पुलिस " दोनो की मरहम पट्टी होती|
गाँधी, प्रतिरोध के हथियार हिंसा का समर्थन करने वालो को बुरी तरह फटकारते, साथ ही सरकारी हिंसा पर, हर स्तर पर इसकी अवज्ञा करने को कहते, देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले सुभाष बोस के भारत पर बर्मा के रास्ते कूच करने और आजाद हिन्द फ़ौज के जीतते हुए भारत के नार्थ-इस्ट राज्यों को अंग्रेजो से मुक्त करा लेने के बाद भी, गाँधी ने सुभाष बोस का विरोध किया था, ठीक वैसा ही विरोध गाँधी जी हिंसा का रास्ता अपनाये और दिखा रहे नक्सलियों का करते पर समर्थन सरकार का भी नहीं करते, सत्य वैसे भी अक्सर अकेला ही होता है |
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Abhijit Deshmane =आज अगर गांधी जिवित होते तो वो किस के पक्ष्ा में होते नक्सलवादी के साथ या सरकार के साथ ?
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गाँधी सही बात के साथ होते, गांधी न्याय के साथ होते, मानवता के साथ होते, तो जहा आदिवासी सही है, वहा आदिवासियों के साथ होते और जहा सरकार सही है, वहा सरकार के साथ होते, गाँधी के लिए साथ होने का अर्थ, हमेशा ही साथ देना नहीं होता था, एक सच्चा हमदर्द गलत होने पर विरोध भी करता है, तो गाँधी का साथ गुण-दोष के आधार पर होता था, और साधन के साथ -साथ साध्य की पवित्रता उनके लिए आवश्यक थी...
आज के दौर में गाँधी होते, तो वो अपने चेहरे छुपाये बस्तर के जंगलो में हथियार इकठ्ठा कर, अगली हिंसा की तैयारी करने की बजाय "न मानेगे - न मारेगे" का नारा देकर, बस्तर में ही बैठ जाते, आदिवासियों को ग्राम-स्वराज्य के मानी बताते, उन्हें आत्म-निर्भर बनने के तरीके सिखाते, वो समझाते सरकार तुम्हारी दुश्मन नहीं, गलत नीतिया तुम्हारी दुश्मन है, सरकारे बदलती रहती है, पर शासन नीतियों से चलता है, लिहाजा नीतिया बदलने को संघर्ष करो, गाँधी गाव-गाव में पाठशाला खोलते कि बच्चे पढ़े, स्कूलों को डायनामाईट से नहीं उड़ा देते |
वो गाव वालो को कहते, इन अधिकारियो का सम्मान करो, ये तुम्हारी सरकारों की नुमाइंदगी करते है पर इनके जन-विरोधी काम करने पर इनकी अवज्ञा करो, सो जाओ सड़को पर, जिनसे तुम्हारे जर-जंगल-जमीन को नष्ट करने के इरादे से इनकी गाड़िया जाए | बन जाओ अपने जंगल के पहरेदार | वो वही डेरा डाल देते, खेतिया करवाते, पशु पलवाते, गाधी "समृधि और सद्बुद्धि" दोनों की बात करते | आन्दोलन के दौरान, बरसती लाठियों की पहली लाठी, गाँधी पर गिरती पर लाठी चार्ज के बाद, घायलों की सेवा-श्रुष्णा करने को साथ चलता चिकित्सा दल, गाँधी की मरहम पट्टी सबसे बाद में करता और इस मरहम पट्टी के दौरान "आन्दोलनकारी और लाठी बरसाने वाली पुलिस " दोनो की मरहम पट्टी होती|
गाँधी, प्रतिरोध के हथियार हिंसा का समर्थन करने वालो को बुरी तरह फटकारते, साथ ही सरकारी हिंसा पर, हर स्तर पर इसकी अवज्ञा करने को कहते, देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले सुभाष बोस के भारत पर बर्मा के रास्ते कूच करने और आजाद हिन्द फ़ौज के जीतते हुए भारत के नार्थ-इस्ट राज्यों को अंग्रेजो से मुक्त करा लेने के बाद भी, गाँधी ने सुभाष बोस का विरोध किया था, ठीक वैसा ही विरोध गाँधी जी हिंसा का रास्ता अपनाये और दिखा रहे नक्सलियों का करते पर समर्थन सरकार का भी नहीं करते, सत्य वैसे भी अक्सर अकेला ही होता है |
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