Thursday, May 23, 2013

हुए तुम दोस्त जिनके, उसका दुश्मन हवा क्यों हो ?

औरत, औरत ही होती है, चाहे वो बाजारू, “धंधे-वाली” हो अथवा हमारे-आपके घर की घरेलू औरतें | एक औरत होने की वजह से, एक औरत को मिलने वाले, सम्मान का हक़दार दोनो औरते होंगी | लेकिन अगर एक धंधे-वाली औरत राह चलते अपने भद्दे-इशारे इशारे और भाव-भंगिमा दिखाती चले, तथा बोलने का मौका मिलते ही अपनी गलियों वाली अश्लील टिप्पड़ियो के साथ बात करते हुए, अपने लिए सारी मर्यादाओ को ताक पर रख दे, तो वहा स्थिति क्या होगी?

क्या घरेलू औरतें, उनके हाथ नचा कर, भद्दे इशारे के साथ यह पूछने पर कि “क्या रे, क्या बात करती तू, तू भी औरत-मै भी औरत, क्या अंतर, तेरे में –मेरे में ? इसका सही जबाब दें पायेगी ? इसका सही जबाब उस दूसरी घरेलू औरत के पास नहीं, बाजारू औरत की, अगर कोई इस धंधे से दूर बेटी है, उसके पास होगा, पर वहा यह सवाल पूछने का बाजारू औरत के पास साहस नहीं होगा |

औरत दोनो है, एक औरत के नाते उसे उसका मिलते वाला ‘नारियोचित” सम्मान मिलना ही चाहिए, पर जैसे ही, वह अपने लटके –झटके, अश्लील इशारे और भद्दी जुबान का इश्तेमाल करना शुरू करती है, वह अपने आप को औरत से एक “बिकने को तैयार वस्तु” ( saleable stock or commodity) बना देती है और ऐसा करते ही वह नारी की गरिमा पर चोट करती है|

इसके बाद भी, अगर एक घरेलू औरत यह कहती है, मेरे लिए हरेक औरत, सिर्फ औरत है और इसके जबाब में बाजारू औरत ये कहे, तो चल अपना घर खाली कर वहा मै बैठती, तू चल कोठे में बैठ | आज से मेरा नाम “घरेलू औरत और तेरा बाजारू औरत” तो क्या कोई अंतर आ जायेगा, बाजारू औरत घर को कोठे में तब्दील कर देगी और घरेलू औरत कोठा भी घर में बदल देगी और सौ-पचास साल बाद “घरेलू औरत” का मतलब लोग धंधा करने वाली, जबकि “बाजारू औरत” का मतलब इससे इतर औरत का लगायेगे |

उपरोक्त उदाहरण, मात्र, एक स्थिति स्पष्ट करने के लिए दिया गया है, और इसका कतई भी आशय, अपनी उन बहनों की स्थिति अथवा उनके चरित्र पर प्रश्न चिन्ह लगाना नहीं है, जो अपनी किसी भी मजबूरी की वजह से इस तरह के नारकीय जीवन को जी रही है, यहाँ आशय सिर्फ “इशारे-भाषा-भंगिमाओ और मानसिकता” का है |

एक व्यक्ति के व्यक्तित्व में उसकी मानसिकता का बहुत बड़ा हाथ होता है, मेरे दो मित्र (समर अनार्य और अनिल कुमार) हालाकि दोनो कम्युनिस्ट है (अपने अपने दावे से ) पर अनिल भाई की और समर भाई की आपस के कुछ मतभेद है| मै कम्युनिस्ट नहीं हूँ, पर अनिल भाई की एक सार्वजनिक पोस्ट की एक टिप्पड़ी पर, मैंने अपनी आपत्ति जताई, निश्चित ही अनिल भाई का व्यवहार और प्रतिक्रिया शालीन रही, और मै अनिल भाई को अपनी मित्र-सूचि में देखकर खुश हूँ, पर हमारे वार्ता में कुछ अन्य सज्जन भी कूद पड़े, शुरू से अंत तक मेरी शालीनता और शब्दों पर नियंत्रण कायम रहा, पर एक सज्जन “अशोक दुषाध” महोदय अपने उजबक तर्कों के साथ हाजिर “जो भी ब्राह्मण वो ब्राह्मणवादी” एक दुसरे सज्जन आलोक रंजन महोदय भी अवतरित हो आये | इन आलोक रंजन महोदय ने मुझे “चोर” बना दिया और अशोक दुषाध महोदय ने “चमचा”|

कम्युनिष्ट होने का दावा करने वाले हमारे ये भाई, अपने “दलित” होने और इसकी बिना पर या तो “लुटने” की बात करते है (मंटो की कहानी, कम्युनिज्म, यहाँ लूटमार –डकैती के इसी तरह के सन्दर्भ में है) या “तुम हटो अब हमें गद्दी दो” कह कर भीख मागते लगते है (पूरी वार्ता नीचे टिप्पड़ियो में पेस्ट कर रहा हूँ), बात करने के क्या इसी सलीके से, आप अपना, अपने परिवार का और अपने समाज का प्रतिनिधित्व करेगे? और अगर हाँ, तो जनाब आप जैसो के लिए ही फ़िराक (अगर मै सही हूँ) ने कहा था ;- “हुए तुम दोस्त जिनके, उसका दुश्मन हवा क्यों हो ?”

दुश्मनों का सारा काम तो आप ही कर देंगे :)

Ashok DusadhAnil KumarAlok RanjanSamar Anaryaनलिन मिश्राKashyap Kishor Mishra

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