Thursday, May 30, 2013

मजदूर दिवस और मजदूर औरते ...!


सिमोन द बोउवार की किताब है "द सेकेण्ड सेक्स" काफी पहले लिखी यह किताब पहली बार अपने विद्यार्थी जीवन के दौरान पढ़ते हुए, कुछ उग्र सी लगी थी, पर गलत कुछ नहीं लगा, सिमोन से सहमत मै तब भी था, और अब भी हूँ...
मजदूर दिवस ने बड़े रंग बदले है, यूरोपियन मूर्तिपूजको के त्यौहार से वर्तमान अन्तर्रष्ट्रीय मजदूर दिवस तक...पर मजदूरो की हमारी कल्पना में हमेशा श्रमिक एक "मर्द या मजदूर" ही होता है, जबकि आमतौर पर हरेक मजदूर अपने घर में एक "बंधुआ मजदूरनी " पालता है...!
हमारे समाज में, औरत का हरेक चेहरा;- माँ, बहन, बेटी , पत्नी , प्रेमिका , भोग्या;- कही न कही सेवा अर्पित करते मजदूर का ही चेहरा है ...
ऐसे में दो खबरे , जो इस आधी आबादी के परवाज को हौसला देती है;-
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पहली;- बांग्लादेश के इतिहास में पहली बार किसी महिला को संसद के स्पीकर के रूप में चुना गया है, शिरीन शरमीन चौधरी को बांग्लादेश की सत्तारूढ पार्टी आवामी लीग ने एकमत से बतौर स्पीकर चुना।
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...और दूसरी बहन Sudha Arora के स्टेटस से ;- मुंबई के इमामबाड़ा इलाके में स्थित 152 साल पुरानी मुगल मस्जिद के मुख्य हॉल के दरवाज़े पहली बार औरतों के लिये बृहस्पतिवार की दोपहर को खोल दिये जायेंगे . अब तक वहां सिर्फ पुरुष इबादत के लिये जाते थे और औरतों की जगह मुख्य हॉल से सटे बंद गलियारों में थी.
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