एक
थे, स्वयंभू मनु वो जब क्रीज में उतरते थे , तो गेंदबाज गेंद खुद सीमा रेखा
के पार फ़ेक देते थे, मनु पहले ज्ञात ब्राह्मण क्रिकेटर थे, परशुराम भी
क्रिकेट अच्छी खेलते थे, पर उनके आश्रम की टीम, रजवाड़ो की टीम से बुरी तरह
हार गयी, इससे कुपित परशुराम ने न सिर्फ क्षत्रियो के प्रति दुर्भावना पाल
ली, बल्कि क्षत्रिय राजाओ को इक्कीस बार, युद्ध में पराजित किया |
विश्वामित्र गेंदबाजी बहुत बहुत और बहुत अच्छी करते थे, उनके सामने वशिष्ठ का एक ओवर भी टिकना कठिन हो जाता था, तब एक ओवर में आठ गेंदे फेकी भी जाती थी, लिहाजा वशिष्ठ ने युक्ति से काम लिया, उन्हें पता था विश्वामित्र उग्र स्वभाव के है, लिहाजा वो जब गेंददाजी के लिए आते, तो वशिष्ठ अपने धोती का पिछौटा ढ़ीला कर देते, और जब विश्वामित्र की दौड़ पूरी हो जाती, तो गेंद फेकने के ठीक पहले, अपनी धोती ठीक करने के बहाने, वशिष्ठ उन्हें रोक देते, लिहाजा कुपित विश्वामित्र के मुह से अपशब्द निकल जाते और इस वजह से उनपर प्रतिबन्ध लग जाया करता | ऐसा विश्वामित्र के साथ इतनी बार हुआ कि वो क्रिकेटरों के ग्रैंड क्लब के सदस्य कभी नहीं बन पाए |
क्रिकेट में स्लेजिंग की शुरुआत भी, विश्वामित्र से ही मानी जाती है ...
दुर्वाषा अत्यंत क्रोधी क्रिकेटर थे, भद्र-पुरुषों के इस खेल में शरीर को निशाना बना आक्रमण करने की शुरुआत दुर्वाषा की मानी जा सकती है, उनकी बाडी-लाइन गेंदबाजी का शिकार एकेडमी की एक उदयमान बालिका क्रिकेटर शकुंतला हुई | नेट पर प्रेक्टिस के दौरान दुर्वाषा ने शकुन्तला के शरीर को लक्ष्य कर ऐसी गेन्दाजी की, कि शकुन्तला के मन में बल्लेबाजी करने के नाम से ही भय बैठ गया, लिहाजा वो शर्म से छुप गयी, उसके प्रेमी महान क्रिकेटर दुष्यंत उसे भूल गए, पर शकुन्तला के पुत्र भरत ने दुर्वाषा के बाडी लाईन गेन्दाजी का मुहतोड़ जबाब दिया और सिर्फ सत्रह गेंदों में अपना शतक पूरा किया जिसमे ग्यारह गेंदे दुर्वाषा ने डाली थी, भरत के इस पराक्रमी प्रदर्शन में, दुष्यंत ने अपनी अतीत की प्रेमिका शकुन्तला की धाकड़ बल्लेबाजी की झलक देखी और बरसो से भूल चूकी अपनी प्रेमिका की उन्हें सहसा याद हो आयी |
बाद में आग्ल क्रिकेटर डगलस जार्डिन भी, दुर्वाषा के ही नक़्शे कदम पे चला |
द्रोण एक अत्यंत श्रेष्ठ कोच थे, पर उन्होंने अपने एकेडमी के खिलाड़ी को टीम में बनाये रखने के लिए, एकलव्य का अंगूठा कटवा लिया, जिससे वो गेंददाजी में असमर्थ हो जाये, महाभारत स्टेडियम में पांड्वो और कौरवों के बीच उस काल का विश्वकप हुआ था, जिसमे उस काल के करीब सभी महान ब्राह्मण क्रिकेटरों ने भाग लिया था |
क्रिकेट में ब्राह्मणवाद की किताब का परिशिष्ट (एक )
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सन्दर्भ;- Shambhunath Shukla सर की टीप :-
देश के जाने माने इतिहासकार और वरिष्ठ पत्रकार रामचंद्र गुहा ने क्रिकेट को ब्राह्मणों का खेल कहा है। एक जमाने में तो इसमें ब्राह्मणों के सिवाय सभी का प्रवेश वर्जित था। मुसलमानों को छूट थी क्योंकि मुसलमान और ब्राह्मणों के फ्यूडल हित एक दूसरे की पूर्ति में सहायक होते हैं। लगता है कि ब्राह्मणवाद के पतन के साथ-साथ इस खेल को भी अब गर्त में जाना होगा।
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विश्वामित्र गेंदबाजी बहुत बहुत और बहुत अच्छी करते थे, उनके सामने वशिष्ठ का एक ओवर भी टिकना कठिन हो जाता था, तब एक ओवर में आठ गेंदे फेकी भी जाती थी, लिहाजा वशिष्ठ ने युक्ति से काम लिया, उन्हें पता था विश्वामित्र उग्र स्वभाव के है, लिहाजा वो जब गेंददाजी के लिए आते, तो वशिष्ठ अपने धोती का पिछौटा ढ़ीला कर देते, और जब विश्वामित्र की दौड़ पूरी हो जाती, तो गेंद फेकने के ठीक पहले, अपनी धोती ठीक करने के बहाने, वशिष्ठ उन्हें रोक देते, लिहाजा कुपित विश्वामित्र के मुह से अपशब्द निकल जाते और इस वजह से उनपर प्रतिबन्ध लग जाया करता | ऐसा विश्वामित्र के साथ इतनी बार हुआ कि वो क्रिकेटरों के ग्रैंड क्लब के सदस्य कभी नहीं बन पाए |
क्रिकेट में स्लेजिंग की शुरुआत भी, विश्वामित्र से ही मानी जाती है ...
दुर्वाषा अत्यंत क्रोधी क्रिकेटर थे, भद्र-पुरुषों के इस खेल में शरीर को निशाना बना आक्रमण करने की शुरुआत दुर्वाषा की मानी जा सकती है, उनकी बाडी-लाइन गेंदबाजी का शिकार एकेडमी की एक उदयमान बालिका क्रिकेटर शकुंतला हुई | नेट पर प्रेक्टिस के दौरान दुर्वाषा ने शकुन्तला के शरीर को लक्ष्य कर ऐसी गेन्दाजी की, कि शकुन्तला के मन में बल्लेबाजी करने के नाम से ही भय बैठ गया, लिहाजा वो शर्म से छुप गयी, उसके प्रेमी महान क्रिकेटर दुष्यंत उसे भूल गए, पर शकुन्तला के पुत्र भरत ने दुर्वाषा के बाडी लाईन गेन्दाजी का मुहतोड़ जबाब दिया और सिर्फ सत्रह गेंदों में अपना शतक पूरा किया जिसमे ग्यारह गेंदे दुर्वाषा ने डाली थी, भरत के इस पराक्रमी प्रदर्शन में, दुष्यंत ने अपनी अतीत की प्रेमिका शकुन्तला की धाकड़ बल्लेबाजी की झलक देखी और बरसो से भूल चूकी अपनी प्रेमिका की उन्हें सहसा याद हो आयी |
बाद में आग्ल क्रिकेटर डगलस जार्डिन भी, दुर्वाषा के ही नक़्शे कदम पे चला |
द्रोण एक अत्यंत श्रेष्ठ कोच थे, पर उन्होंने अपने एकेडमी के खिलाड़ी को टीम में बनाये रखने के लिए, एकलव्य का अंगूठा कटवा लिया, जिससे वो गेंददाजी में असमर्थ हो जाये, महाभारत स्टेडियम में पांड्वो और कौरवों के बीच उस काल का विश्वकप हुआ था, जिसमे उस काल के करीब सभी महान ब्राह्मण क्रिकेटरों ने भाग लिया था |
क्रिकेट में ब्राह्मणवाद की किताब का परिशिष्ट (एक )
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सन्दर्भ;- Shambhunath Shukla सर की टीप :-
देश के जाने माने इतिहासकार और वरिष्ठ पत्रकार रामचंद्र गुहा ने क्रिकेट को ब्राह्मणों का खेल कहा है। एक जमाने में तो इसमें ब्राह्मणों के सिवाय सभी का प्रवेश वर्जित था। मुसलमानों को छूट थी क्योंकि मुसलमान और ब्राह्मणों के फ्यूडल हित एक दूसरे की पूर्ति में सहायक होते हैं। लगता है कि ब्राह्मणवाद के पतन के साथ-साथ इस खेल को भी अब गर्त में जाना होगा।
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