वैष्णव जन !!!
संस्कृत
के प्रकांड विद्वान "पण्डित उमादत्त मिश्र" मेरे पितामह के प्रपितामह थे,
उनके पुत्र पण्डित महावीर मिश्र अठ्ठारह सौ सत्तावन की ग़दर में "परसिया
मिश्र" गाँव के बाकी बागियों के साथ चिन्हित किए गए थे और गोरी "टामी फ़ौज"
ने पूरे गाँव पर लगाये जुर्माने को अदा न करने पर समूचे परसिया और मदरिया
गाँव को लूट लिया था, उनकी लूटमार का सामना करने को गाँव में सिर्फ औरते और
बच्चे बचे थे...
...वे औरते गुलाम हिन्दुस्तानियों की थी, और हाँ, वे औरते मेरे परिवार की बहू और बेटिया थी!
मेरे परदादा "पण्डित बटोही मिश्र" और उनके छोटे भाई "पंडित तिलकराज मिश्र"
जब पांच और दो वर्ष के बालक मात्र थे, उनके सर से पिता का साया उठ गया...
पंडित बटोही मिश्र शतायु हो कर मरे और उनका सम्पूर्ण जीवन एक श्रमिक गृहस्थ
का जीवन था, जिसमे गाँव गिराव की चिंता, पास पड़ोस का ख्याल, पनघट की सफाई,
डगर की मरम्मत और "एक रोटी किसी जरूरतमंद को भी जरूर" की प्रतिबद्धता भी
थी, मेरे दादा पंडित रामनिवास मिश्र गाँव के पहले मैट्रिक थे, और नेशनल
इंटर कालेज, बड़हलगंज के पहली मैट्रिक बैच के विद्यार्थी भी थे, वो हमारे
खानदान में पहले सरकारी मुलाजिम भी थे, बेहद सरीफ और मृदुभाषी मेरे दादा की
"वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर परायी जाने रे" में अत्यंत आस्था थी,
उन्हें कभी भी कर्मकांडी होते मैंने नहीं देखा, मेरे पिता "चंद्रमौली
मिश्र" एक सामान्य किसान है ...अपने नाम के आगे पंडित लगाते मैंने उन्हें
कभी नहीं देखा...!
ये था, मेरी पांच पीढियों का इतिहास, मै अपने
को वैष्णव मानता हूँ जिसका अर्थ मेरे लिए भी नरसी मेहता का "वैष्णव जन तो
तेने कहिये जे पीर परायी जाने रे" है | मुझे कही से नहीं लगता कि मुझे
सिर्फ इस वजह से शर्मिंदा होना चाहिए कि मै ब्राह्मण हूँ, और जो सिर्फ इस
वजह से की मै ब्राह्मण हूँ, मुझपर प्रश्न चिन्ह उठाते है तो मुझे जरा
आश्चर्य होता है...!
...मैंने अपनी दादी स्वर्गीय रमाधारी देवी
मिश्रा को चमरौटी में गंदे बीमार बच्चो को अपने सीने से दूध पिलाते देखा है
(जी हा सचमुच), हमारा घर पूरे गाँव में चमरौटी से घिरा हुआ है, और जाति
आधारित वैमनस्य बोने वाले शायद यकी करे न करे , चमरौटी की औरतो ने मेरी
दादी की शवयात्रा रोक दी, उनका अंतिम दर्शन करने के लिए...!
मुझे
गर्व है, अपने पुरखो पर, उनकी उस कालयात्रा पर, जिसकी स्मृति से हुई नम
आँखों का गवाह मेरा बचपन रहा है, मुझे गर्व है, अपने भीतर बहते खून पर,
जिसका संस्कार "पीडक" नहीं, न "आत्म" न "पर" बल्कि वो प्रेम करना जानता
है...!
मै कहा गलत हूँ ...?
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