एक भाषा के लिए, वर्ण (ध्वनि), शब्द और वाक्य संरचना अत्यंत
महत्वपूर्ण है| वर्ण अर्थात ध्वनि, हिंदी में ग्यारह स्वर और पैतीस व्यंजन, अर्थान
कुल छियालिस वर्ण हैं, पर हिंदी के किसी भी बच्चे के अक्षर ज्ञान की शुरुआत बारह अथवा तेरह (ऋ को शामिल कर ले तो ) स्वर और
छत्तीस व्यंजन अर्थात अड़तीस या उनचालीस वर्ण के अभिज्ञान से होती है...
भाषा का सफ़र बोलियों और उपभाषा से होते हुए मानक भाषा तक का होता है, भाषा की व्याख्या में कुछ पद अवश्य नज़र आते है, जैसे “मानक, पद्धति और माध्यम” उक्त तीनो शब्द कही न कही एक “सु-व्यवस्थित तंत्र” की आवश्यकता का बोध कराते है|
बेशक एक भाषा की वाक्य संरचना और शब्द का बहुत बड़ा आधार उसकी बोलिया होती है, पर मानक स्थापित हो जाने के बाद बोलियों के शब्द कतई जरुरी नहीं कि मानक भाषा के शब्द माने जाये| अवधी जो हिंदी के भाषिक विकास के चरण की एक महत्वपूर्ण बोली है, उसमे “श” वर्ण का अभाव है, सम्पूर्ण राम-चरित मानस में “श” वर्ण का कही भी इस्तेमाल नहीं हुआ | अवधी में “शिखा”, “सिखा” है , वैसे ही भोजपुरी के वर्ण और शब्द जिन दीर्घ उच्चारण के साथ व्यवहार में लाये जाते है, उन्हें हिंदी में एकदम ही इस्तेमाल नहीं किया जाता |
लिहाजा, बेशक एक भाषा का स्वरुप बोलियों के मार्फ़त तय होता हो, तथापि यह जरुरी नहीं कि उसकी बोलियों के वर्ण, शब्द और वाक्य विन्यास भी मानक भाषा में जस का तस इस्तेमाल किया जाये |
कभी कभी ऐसा भी होता है, कि कोई एक बोली दो भाषाओं के विकास की संगी रही हो | पंजाबी प्रायः हिंदी के प्राथमिक विकास के चरण की एक बोली मानी जाती है और अब खुद भी एक भाषा मानी जाती है, पर पंजाबी लिखी चाहे गुरुमुखी में जाये या शाहमुखी में, इसका वाक्य विन्यास, और शब्द हिंदी से अलग नजर आते है, जिसकी वजह इसका “प्राकृत” से आगे न बढ़ पाना है| अपने विकास के क्रम में हिंदी प्राकृत से काफी आगे बढ़ चुकी है, लेकिन पंजाबी प्राकृत पे ही अटकी हुई है, यही वजह है, कि हिंदी का जितेन्द्र पंजाबी में जीतेंदर और धर्मेन्द्र, धरमेंदर हो जाता है, और पंजाबी का जीतेंदर,धरमेंदर हिंदी में जितेन्द्र, धर्मेन्द्र हो जाता है|
कई बार भाषा रूपी बहता नीर, जब बरसाती नदी की तरह किसी एक बोली या अन्य भाषा से शब्दों का बेतरह आयात कर रहा होता है, तो उसमे कुछ दिलचस्प बदलाव भी होते है, देवनागरी वर्ण में नुक्ते का इस्तेमाल और अंग्रेजी के कुछ शब्दों की “ऑ” ध्वनि दर्शाने के लिए “बिंदु रहित चन्द्र” का इस्तेमाल इसका एक बेहतर उदाहरण है| पर ये बदलाव और शब्दों का आयात कई बार भाषा के “शब्द विचार” और “वाक्य विचार” को चुनौती देते नजर आते हैं, हिंदी में अत्यंत प्रचलित “अंतर्देशीय” और “असावधान” जैसे शब्द इसका सटीक उदाहरण है, लाख कि ये शब्द हिंदी में इस्तेमाल हो रहे हो, पर जिन अर्थो में इस्तेमाल हो रहे है, वे गलत है, “अन्तःदेशिय” और “अनावधान” सही शब्द है और प्रचलन मात्र में होने से गलत शब्द सही नहीं माना जा सकता अगर वह मानक भाषा के व्यवस्था के प्रतिकूल हो| ठीक ऐसा ही, वाक्य विधान की कुछ प्रचलित विधिया, मसलन “मेरे को नहीं मालूम”, “तूने जाना हो तो बता” आदि सिर्फ प्रचलन में होने से ही हिंदी का अंग नहीं मान ली जनि चाहिए|
वैसे भी बोली जाने वाली और लिखी जाने वाली भाषा अलग अलग ही होती है|
भाषा एक बहता नीर है, इसकी शुचिता महत्वपूर्ण है, बेशक तमामो तमाम तरह की धाराए-उपधाराए आ कर इसमें मिलती है, पर एक नदी को भी सफाई की जरुरत होती ही है |
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