फ़िराक अक्सर बदल कर भेष, फिरता है कोई काफ़िर (...1)
ज़रूरी
यह नहीं, कि आप हिंदू है, मुसलमान है, सिख है या इसाई है, और उनमे भी बाभन
है, राजपूत है बनिए है दलित है, या शेख है, सैयद है, या अंसारी है, या फिर
नामधारी, सरदार या मोना है, या कैथलिक है, प्रोटेस्टेंट है...
सबसे जरुरी बात यह है , की हुकुमन के साथ आपकी गिरह कैसे बंधी है , और
बेशक, ये गिरहबंदी आपको एकदम अपने लाईक और माकूल लग रही हो, साथ ही गाँठ
एक दम सही बंधी नजर आ रही हो , तब भी आँखों का धोखा खा जाना कोई बड़ी बात
नहीं, गो कि गिरह बंधे होने के बाद भी ये जरुरी नहीं, कि इससे आपका फाईदा
सध ही जाये, क्यूकि यहाँ एक बड़ा ही अलहदा हिसाब-किताब काम करता है |
इस हिसाब में, एक बड़ा और जियादा जरुरी पेंच यह होता है, कि बेशक गिरह्बंदी
के बाद भी, आप हुकूमत के लिए जियादा फाईदामंद कैसे हो सकते है, हुकूमते
हमेशा, हमेशा और हमेशा ही सिरफ अपना फ़ाईदा देखती है, और यह तब भी बिलाशक हो
रहा होता है, जब हमें ये लग रहा होता है, कि अपनी अवामियत की नुमाइंदगी के
बूते, हम हुकूमत अपने इजारे पर चला रहे है, हम अपनी रौ में नारे लगा रहे
होते है "जिसकी जित्ती गिनती भारी, उत्ती भारी हिस्सेदारी" हम ख़ुशी ख़ुशी
सोच रहे होते है, हुकूमत हमारी ताबेदार है, और इस जम्हूरियत में हमारी
गिनती के बिना पर ही इनकी हुकूमत चल रही है, पर यक़ीनन सच्चाई इससे अलहदा
होती है |
सोचते रहिये, लगाते रहिये अपने गिनती का हिसाब, आपको
पता नहीं सियासत के हिसाब अलग ही होते है, सियासतदानों के वादे भी अलग ही
होते है, जनाब ये आपको सस्ते दाम पर बिकने वाला बना कर, वक्ती तौर पर अपना
जरखरीद गुलाम बना लेती है, आप उनके झंडो का डंडा बन उन्हें थामे फहराते
रहते है, और सियासत चढ़ते चढ़ते हुकूमत में तब्दील हो जाती है |
पर
ऐसा नहीं है, कि आपके सियासतदानों के ज़हन से आप का ख़याल उतर गया है, गिनती
के लिहाज से आपकी कीमत तो है ही , जनाब लेकिन सियासत खून चढ़ के बोले तो
इसके अलग ही मजे है, इसी बहाने कुछ को निपटाया जा सकता है, जो आज़ाद खयाल
है| कुछ को हटाया जा सकता है, जो दम-दमे के वक्त कीर्तन करते है| ... और
कुछ से छुटकारा पाया जा सकता है, जो जोंक की तरह चिपटे हुए है (अपना फाईदा
सोचते है, नामुराद!)|
हुकूमत अपने अलावा किसी की नहीं होती, और
बस अपना फ़ायदा देखती है, लिहाजा सारी गिरह्बंदी के बाद भी, अगर अपने फायदे
के लिए, आप की लाश पर सियासत की जा सकती है, तो आप कित्ते भी हमनवाज हो
जनाब ...आप तो कटेंगे ही, आप पर कोई रहम नहीं है ...
बकरे की जाति थोड़े होती है मियाँ, उसके बस गर्दन होती है, जो हर हाल में कटती है |
============================================== कश्यप किशोर मिश्रा
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