Saturday, August 24, 2013

रमरतिया की आबरू भी कहीं आबरू होती है ?


 

हे राम ...!

20-जनवरी-1948, को गाँधी जी की प्रार्थना सभा से 75 फीट की दूरी पर एक बम धमाका किया गया, मदनलाल पाहवा गिरफ्तार हुआ जबकि छः अन्य अपराधी एक टैक्सी से फरार होने में सफल रहे | महात्मा गाँधी की हत्या का सन 1934 से यह पांचवा प्रयास था, 30-जनवरी-1948, को हुई गाँधी जी की हत्या छठा प्रयास थी, ये सभी छः के छः प्रयास अतिवादी हिन्दू राष्ट्रवादियो द्वारा किये गए थे |

महात्मा गाँधी की हत्या का पहला प्रयास 25 जून, 1934 को, पूना में किया गया | गांधीजी एक सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे, रास्ते में उनकी मोटर को लक्ष्य करके मोटर पर बम फेंका गया पर गांधीजी पीछे वाली मोटर में थे। गाँधी जी की हत्या का यह पहला प्रयास था, जो पूना के एक कट्टरपंथी हिन्दू गुट ने किया था| पुलिस रिपोर्ट में दर्ज विवरण के अनुसार, गांधीजी की मोटर पर बम फेंक कर उनकी हत्या का प्रयास करने वाले आरोपी के जूते में महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरु के चित्र मिले थे |

जुलाई -1944 में, पंचगनी में, महात्मा गाँधी की हत्या की दूसरी असफल कोशिश हुई, जब महात्मा गाँधी अपनी बीमारी से उठकर स्वाश्थ्य लाभ के लिए पंचगनी गए हुए थे | इस खबर के फैलने के बाद पूना से 20 युवकों का एक दल बस से पंचगनी पहुंचा इस गुट ने समूचे दिन गांधीजी के विरोध में नारेबाजी की, इस गुट के नेता को गांधीजी ने बातचीत करने का न्योता दिया, पर उसने गांधीजी से, किसी भी तरह की बातचीत करने से इंकार कर दिया, शाम को प्रार्थना सभा में यह नवयुवक हाथ में छुरा लिए, गांधीजी की तरह लपका, प्रार्थना सभा में मौजूद, पूना के ही, सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के युवक ने हमलावर को पकड लिया और पुलिस को सौप दिया। पुलिस-रिकार्ड में हमलावर का नाम नहीं है, परन्तु मशिशंकर पुरोहित तथा भीलारे गुरुजी ने गांधी-हत्या की जा!च करने के उद्देश्य से, 1965 में बिठाये गए कपूर-कमीशन के समक्ष उक्त हमलावर की पहचान नाथूराम गोडसे के रूप में की थी।

गांधीजी की हत्या की तीसरी कोशिश सितम्बर-1944 में, वर्धा में, की गई | गांधीजी मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बम्बई जाने वाले थे। गांधीजी के बम्बई जा कर जिन्ना से बात करने का, कुछ लोग विरोध कर रहे थे, इन्ही विरोध करने वालों का एक समूह पूना से वर्धा पंहुचा, पुलिस रिपोर्ट में दर्ज विवरण के अनुसार, उस गुट के ग.ल. थने के नाम के व्यक्ति के पास से छुरा बरामद हुआ। अपने बयान में उसने बताया की यह छुरा वह गांधीजी की मोटर पंचर करने के उद्देश्य से लेकर आया था | महात्मा गाँधी के निजी सचिव प्यारेलाल ने उस घटना का विवरण देते हुए लिखा है "आज सुबह मुझे टेलीफोन पर जिला पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट से सूचना मिली कि स्वयंसेवक गम्भीर शरारत करना चाहते हैं, इसलिए पुलिस को मजबूर होकर आवश्यक कार्रवाई करनी पडेगी। बापू ने कहा कि मैं उनके बीच अकेला जाउगा और वर्धा रेलवे स्टेशन तक पैदल चलूगा, स्वयंसेवक स्वयं अपना विचार बदल लें और मुझे मोटर में आने को कहें तो दूसरी बात है। किन्तु बापू के रवाना होने से ठीक पहले पुलिस-सुपरिन्टेण्डेण्ट आये और बोले कि धरना देने वालों को हर तरह से समझाने-बुझाने का जब कोई हल न निकला, तो पूरी चेतावनी देने के बाद मैंने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है।

धरना देनेवालों का नेता बहुत ही उनेजित स्वभाववाला, अविवेकी और अस्थिर मन का आदमी मालूम होता था, इससे कुछ चिंता होती थी। गिरफ्तारी के बाद तलाशी में उसके पास एक बडा छुरा निकला।" (महात्मा गांधी : पूर्णाहुति : प्रथम खण्ड, पृष्ठ 114)

29 जून, 1946 को गांधीजी की हत्या की चौथी कोशिश हुई, जब गांधीजी एक विशेष टेंन से बम्बई से पूना जा रहे थे | नेरल और कर्जत स्टेशनों के मध्य रेल की पटरी पर एक बड़ी चट्टान कुछ अराजक तत्वों ने रख दी, ट्रेन के ड्राइवर की सूझ-बूझ और सावधानी से एक भयानक हादसा टल गया और गांधीजी सकुशल पूना पहुँच गए| अगले दिन, 30 जून को प्रार्थना-सभा में गांधीजी ने बीते दिन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा ''परमेश्वर की कृपा से मैं सात बार अक्षरशः मृत्यु के मुह से सकुशल वापस आया हू। मैंने कभी किसी को दुख नहीं पहुचाया। मेरी किसी के साथ दुश्मनी नहीं है, फिर भी मेरे प्राण लेने का प्रयास इतनी बार क्यों किया गया, यह बात मेरी समझ में नहीं आती। मेरी जान लेने का कल का प्रयास निष्फल गया।'

गांधीजी की हत्या का पांचवा प्रयास मोहनलाल पाहवा ने किया और छठवे प्रयास में 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी।

गांधीजी की हत्या के आरोप में विनायक दामोदर सावरकर, नाथूराम, नारायण आप्टे, सहित आठ लोगों पर हत्या का अभियोग चला, फ़रवरी 1949 में नाथूराम और नारायण आप्टे को मृत्युदंड अन्य पांच को आजीवन कारावास और सावरकर को सबूतों के अभाव का लाभ देकर बरी कर दिया गया |नाथूराम और आप्टे को नवम्बर 49 में फांसी पर लटका दिया गया |

सावरकर ने, जिरह के दौरान नाथूराम अथवा किसी भी अभियुक्त के साथ अपने सीधे सम्बन्धो की बात या कभी मुलाकात की बात नकारी, जो बाद में प्रकाश में आये तथ्यों के लिहाज से झूठी साबित हुई, सावरकर ने नाथूराम का इस्तेमाल किया था, नाथूराम उनका अंधभक्त था, सन 1940 में, हिन्दू महासभा के अध्यक्ष सावरकर के आदेश पर, हैदराबाद के निजाम की नीतियों का विरोध करने वाले पहले जत्थे का नेतृत्व नाथूराम ने किया था और गिरफ्तार होकर निजाम की जेल की सजा भी भुगती थी |

नाथूराम ने जिरह के दौरान दिए अपने बयान में, सावरकर के हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति अपनी निष्ठां व्यक्त की |

गांधीजी की हत्या के 20 जनवरी के प्रयास और 30 जनवरी की हत्या की अनसुलझी गुत्थियों और गांधीजी की हत्या में सावरकर की संलिप्तता का पता लगाने के लिए, भारत सरकार ने 1965 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में एक कमीशन बनाया जिसने उन तथ्यों की भी पड़ताल की, जिन्हें गांधीजी की हत्या के लिए चले मुक़दमे की जिरह के दौरान नहीं प्रस्तुत किया गया था, कमीशन ने सावरकर के अंगरक्षक रहे अप्पा रामचंद्र कसर और उनके सचिव गंजन विष्णु दामले के बयान भी लिए, यदि उक्त दोनों के बयान गाँधी हत्याकांड के दौरान लिए गए होते तो सावरकर का झूठ सामने आ जाता और भी गाँधी हत्या के दोषी करार दिए गए होते |

कमीशन के तथ्यों से यह प्रमाणित हुआ, कि 1948 की जनवरी 14 और 17 को नाथूराम और आप्टे ने सावरकर से मुलाकात की थी, कसर ने कमीशन को बताया की नाथूराम और आप्टे ने पुनः जनवरी 23 को, बम धमाके के बाद, दिल्ली से लौटने के बाद, सावरकर से मुलाकात की थी ...

दामले ने कमीशन को बताया; "आप्टे और गोडसे ने जनवरी के मध्य में सावरकर को देखा और वो साथ ही बगीचे में बैठे"

कपूर कमीशन के तथ्य एकदम स्पष्ट थे, उन्होंने पुलिस की भयानक लापरवाही को उजागर किया, जो अगर नहीं की गई होती तो गांधीजी की हत्या में सावरकर की संलिप्तता साफ साफ साबित हो जाती |

बहरहाल, सावरकर सबूतों के अभाव में अपने को बचा ले गए और नाथूराम और नारायण आप्टे नवम्बर-1949 की एक सुबह, "अखण्ड भारत अमर रहे" का नारा लगाते फांसी के फंदे पर झूल गए, उन्हें सपने में भी गुमान नहीं था, कि जिस व्यक्ति की उन्होंने हत्या की "अखण्ड भारत" उसका सबसे बड़ा सपना था |

प्रेमचंद्र और उनकी प्रगतिशीलता ...

प्रेमचंद को कम्युनिष्ट मानने वालों का कहना है कि उनपर सोवियत रूस की क्रांति का असर था और ऐसा लगता है कि वे रुसी क्रांति से प्रभावित थे, टॉल्स्टॉय उन्होंने पढ़ रखा था और वे प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्ष भी थे लिहाजा ये सारी बातें उनके वामपंथी रूझान को साफ करती है |

पर प्रेमचंद की लेखकीय प्रगतिशीलता का आशय, समाज की रुढियो से मुक्त सोच से था,1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए कहा भी था कि लेखक स्वभाव से प्रगतिशील होता है और जो ऐसा नहीं है वह लेखक नहीं है।

प्रेमचंद कभी भी गाँधी की विचारधारा से अलग नहीं हुए, हां उन्होंने रूस की तारीफ़ जरूर की थी, लेकिन रूस के संबंध में मुंशी प्रेमचन्द की राजनीतिक समझ की कमी थी जैसा कि उस समय बहुत सारे लोगों के साथ थी, यह बात उनके जोसेफ स्टालिन की प्रशंसा करते लिखे लेख से भी स्पष्ट हो जाती है |

उनकी जीवनी में इस बात का ज़िक्र मिलता है, कि नौकरी छोड़ने के बाद प्रेमचंद चरखा, स्वदेशी और स्वराज के प्रचार में लग गए थे |गोरखपुर से लमही जाकर उन्होंने चरखे बनवाकर भी बाँटे | इस बात का भी ज़िक्र मिलता है कि सन् 1930 में जब वह लखनऊ के अमीनुद्दौला पार्क में रहते थे तो नमक क़ानून के खिलाफ सत्याग्रह करने वालों को अपने हाथ से कुर्ता और टोपी पहनाकर रवाना करते थे |

प्रेमचंद के लिए प्रगतिशील होने का तात्पर्य सांप्रदायवाद, जातिवाद, छूआछूत और स्त्रियों की स्वाधीनता से था, यही वजह थी की वह आर्य समाज से अत्यंत प्रभावित थे और 1906 में उन्होंने एक विधवा शिवरानी देवी से अपना दूसरा विवाह किया |

यहाँ यह भी ध्यान रखने की बात है, कि 1934 में प्रेमचंद बम्बई गए थे और वहाँ से उकता कर पुनः बनारस भाग आये, आने के पश्चात् पत्नी शिवरानी देवी ने उनसे कांग्रेस के टिकट पर काउंसिल चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा, लेकिन प्रेमचन्द ने इसे नामंजूर कर दिया और कहा,"मेरा काम काउंसिल में काम करने वालों की समालोचना करना हैं." ध्यान दे प्रस्ताव कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का था |

लिहाजा कम से कम जैसा की दावा किया जा रहा है , उस लिहाज से प्रेमचंद वामपंथी नहीं थे, हां वामपंथ से प्रभावित जरुर थे और अंत तक वो गांधीवादी रहे |

क्या वाकई इकबाल पाकिस्तान के सह संस्थापक थे ?

हमारे खूब सारे पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी भाई , अक्सर अल्लामा इकबाल को पाकिस्तान की मजहबी सोच की बुनियाद की एक मजबूत ईट मानते है, पर अक्सर इकबाल का एक अलहदा चेहरा भी नुमाया होता रहता है, एक ऐसा इकबाल जो, हरियाला बन्ना, मजहबी हरियाली से रंगा होने से नहीं बल्कि अपनी माटी की समरस खाद पानी की वजह से हरियाला दिखता है, भला एक कट्टरपंथी मजहबी नमाज अदा करने का जिक्र चलने पर बेसाख्ता ही कैसे बोल उठता है:-
"जो मैं सर-ब-सजदा हुआ कभी, तो ज़मीं से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम आश्ना, तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में|

बात यही नहीं रूकती, वह अपने तरन्नुम में काफ़िरो के शिवाले की तामीर की बात करने लगता है और आप मानते रहें शिर्क, पर यह अपनी बात कहते बाज नहीं आता कि;-
"सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्‍ती
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें

दुनिया के तीरथों से ऊंचा हो अपना तीरथ
दामान-ए-आस्‍मां से इसका कलस मिला दे"

मै अचरज में हूँ, वाकई गोकि इकबाल जिन्ना नहीं थे, लिहाजा लकीरों के मानी उन्हें जिन्ना के मुकाबिल खूब खूब और खूब पता थे, बेशक जिन्ना के साथ इकबाल को पाकिस्तान का सह संस्थापक माना जाता रहा है, लेकिन मशहूर पाकिस्तानी अखबारनवीस इरशाद हक्कानी के अनुसार इकबाल ने भारत से बाहर मुस्लिम मुल्क की बात कभी नहीं की, बल्कि भारत के भीतर ही एक मुस्लिम राज्य का प्रस्ताव रखा था।

हक्कानी के दावे पर हालांकि पाकिस्तान के दो मुख्य इतिहासकारों फतेह मोहम्मद मलिक और डॉ. सफदर महमूद ने सवालिया निशान लगाते हुए कहा कहा कि इकबाल ने ब्रिटिश हुकूमत से बाहिर एक अलग मुल्क की बात की थी, जो जाहिर तौर पर भारत के बाहर ही होता। मलिक ने उनके दावे को खारिज करने वाले दो और इतिहासकारों के. अजीज और डॉ. मुबारक अली को आलोचना करते हुए कहा कि 1930 में अपने संबोधन में इकबाल ने दक्षिण एशिया में मुसलमानों के लिए अलग देश की परिकल्पना की थी।

मगर दिलचस्प है, कि सुहैल जहीर लारी की ' ए इलस्ट्रेटेड हिस्ट्री ऑफ सिंध ' के नए संस्करण में ई. जे. थॉमस लिखे इकबाल के एक ख़त को शाया किया गया है। इसमें इकबाल लिखते हैं , ' मैंने एक गलती की है जिसे मैं तुरंत बता दूं क्योंकि मुझे लगता है कि यह काफी गंभीर है। मुझे पाकिस्तान नाम की एक योजना का कर्णधार बताया जा रहा है। पाकिस्तान मेरी योजना नहीं है। मैंने अपने संबोधन में ये सुझाव रखा था वह एक मुस्लिम प्रांत यानी प्रस्तावित भारतीय संघ के पश्चिमोत्तर हिस्से में जहां मुस्लिमों की ज्यादा आबादी है को देश का एक प्रांत बनाने संबंधी था। ' लिहाजा इसमें कोई शुबहा नहीं कि इकबाल ने अपने मित्र थॉमस को पत्र लिखकर अपनी बात साफ़ कर दी थी की वह पाकिस्तान की कल्पना के हिस्सेदार नहीं है |

सावन का पहला सोमवार और एक नास्तिक व्रती ..!

आज की सुबह जरा व्यस्त रही और करीब साढ़े सात बजे जब मै सुबह की पहली चाय पी रहा था, मेरी पत्नी ने मुझे बताया आज सावन का पहला सोमवार है, उसे पता है, मै मंदिर नहीं जाता, पूजापाठ नहीं करता, कोई व्रत नहीं रखता पर उसने मुझसे सीधे सीधे बताया "आज आपका व्रत है, न " मैंने उसकी तरफ देखते हुए लगभग पूछा "व्रत...?" "मै कबसे व्रत रखने लगा ?" मेरी पत्नी ने बताया "आप पिछले साल भी व्रत थे, मेरे साथ ही" और फिर उसने मेरी तरफ से तय भी कर दिया "हम दोनों का आज व्रत है "|

घर से कार्यालय आते याद आया, बीते साल सावन के पहले सोमवार को हम जबकि खाम्भारखेडा थे, मेरी पत्नी पूरे परिवार के साथ लिलौटीनाथ का दर्शन करने गयी थी और मैंने दर्शन करने जाने या व्रत रखने से साफ मना कर दिया था और अपने लिए सबकी गैर-मौजूदगी में अपना भोजन खुद बनाया था|

...फिलवक्त प्लांट पे हू, यहाँ व्रत के लिहाज से कुछ खा सकू ऐसा कुछ भी उपलब्ध नहीं, मेरा व्रत इश्वर के लिए कतई नहीं, न ही ईश्वर के प्रकोप से मै भयभीत होने वाला मै आदमी हू, पर प्रायः मुझसे झूठ न बोलने वाली मेरी पत्नी, जब झूठ बोल कर मुझे व्रत रखने की कोशिश कर सकती है, तो क्या मुझे उसकी इस कोशिश को सफल होते देखने के सुख से वंचित करना चाहिए ?

मेरी माँ भी, ऐसी ढेर सारी कोशिशे करती थी ...!

(शायद धर्म के "धारयति सः धर्मम" का मर्म यही रहा होगा !)

बच्चे जो सुनते है ...!

बच्चे जो सुनते है,
वही याद कर लेते है|

वो याद कर लेते है,
सुन-सुन कर एक इतिहास
जो कभी घटा ही नहीं
उनके जहन में नक्स हो जाती है,
वो अपराधी सूरते,
जिनका अपराध से,
दूर दूर तक, कोट नाता नहीं होता|

बच्चे सुन-सुन कर
याद कर लेते है
अपने उद्धारकों के चेहरे |
जिन्होंने
उनके हांथो में कटोरे थमाये,
उनके निवाले छीन कर,
ख़ुद के महल बनाये|
और, ना जाने कितने बचपन की,
पूरी उमर के मानी,
बस बचपन तक ही,
रख डाला |

बच्चो ने सुना
और याद कर ली,
काफिर पहचान|
चीन्हने लगे,
मुर्गी की शुतुरमुर्गी चाल,
आदमी बैताल |

बच्चे जो सुनते है,
वही याद कर लेते है |
यह बात...
बच्चो को नहीं पता,
और
हम सब के लिए
लगभग बेपता होती है|
पर...
जिन्हें बच्चो के करीब भी
नहीं फटकना चाहिए !
उन्हें यह,
बहुत अच्छे से पता है !
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कश्यप किशोर मिश्र
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धन्यवाद Shayak Alok को
सन्दर्भ ;- एक बच्चा बोलता है कि हेडमास्टरनी जी ने जहर मिला दिया था .. दूसरा बच्चा टोकता है उसे - नहीं, नीतीश कुमार जहर मिलाया .. तीसरा कहता है नीतीश को जेल भेजने के लिए विरोधी जहर मिला दिया ..."बच्चे जो सुनते हैं उसे याद कर लेते हैं"|
 

किसी भी शायर ने आज तक "ख़ुद" कभी नहीं लिखा !

निदा फ़ाजली साहब का एक शेर है;-
"मेरे जैसा आदमी, मेरा ही हमनाम 
उल्टा सीधा वो करे, मै होऊ बदनाम "
तो निदा साहब तौबा-तौबा करते रहते है और उनके ये नामालूम हमशक्ल और हमनाम साहब आकर कभी "मस्जिदों से उठ उठ के नमाजी चले गए" पढ़ आते है, तो कभी "मस्जिद आलीशान" को देख, "एक अकेले के लिए इनता बड़ा मकान ?" पूछने लगते है |
बशीर बद्र ने भी एक आदमी में अनेक आदमी होने की बात की है ...

लिहाजा वाकई में, तो दुनिया के सारे के सारे दीवान उन शायरों के हमशक्ल और हमनाम लोगों ने ही लिखे है, पर वो तो लिख कर गायब हो जाते है, लिहाजा हम उनकी बची शक्ल और नाम वाले आदमी को उनका असल शायर मान बैठते है ...

यही वजह थी कि, फ़िराक भी, अल्ल सुबह फजिर की नमाज के समय उठते तो "फ़िराक, अक्सर बदल कर भेष, फिरता है कोई काफ़िर" कह आईने में ख़ुद को देखकर तस्दीक कर लेते, हाँ ! ये वही भेष बदला काफ़िर है, और नमाज अदा करने की बजाय, लम्बे हो रहते, बाद में मुसलमान बन आठ बजे उठते |(अब यह मत पूछियेगा ये रघुपति सहाय कौन था ?) ऐसे ही उस काफ़िर ग़ालिब ने "बैल है, तभी तो मस्जिद में जा रहा है" कह कर मियां ग़ालिब को शर्मिंदा किया था |

यहाँ तक तो चलो, सब ठीक ठाक था, पर एक रात शायरों के हमनाम और हमशकल एक ऐसे ही शख्स ने, जो "मुहम्मद अल्वी" साहब के साथ साथ रहता है, लिख मारा और ख़ुद गायब हो गया, कि ;-
अगर तुझको फुर्सत नहीं तो ना आ, मगर एक अच्छा नबी, भेज दे
क़यामत के दिन खो ना जाएँ कहीं, ये अच्छी घडी है, अभी भेज दे|
इसे लिखने के सत्रह साल बाद जाकर जब चिल्ल पों मची, तो मुहम्मद अल्वी साहब ने ख़ुद को इस शेर की वल्दियत से अलग कर दिया, अब ये शेर जामा मस्जिद की सीढियों पे अनाथ होने के बाद बैठ कर, आते जाते हर नमाजी में अपने पिता को ढूढ़ता फिरता है और जनाब शाही इमाम से इसका जब भी साबका होता है, जनाब शाही इमाम पता नहीं क्यों गीदड़ हो जाते है, सोचता हूँ इस अनाथ शेर को JNU का पता देकर Khurshid सर के पास भेज दूँ ...

वैसे जनाब मुहम्मद अल्वी साहब का यह हमशक्ल और हमनाम चुपके से आकर एक रात फिर लिख गया, कि
"गिराना ही है तो मिरी बात सुन
मैं मस्जिद गिराऊँ तू मंदिर गिरा"
ये अलग बात है, कि अभी भी हम इसे उनका ही शेर मान रहे है, जबकि मुझे पक्का पता है, इसे लिखने वाला और एक और नबी भेजने वाले शेर को लिखने वाला आदमी एक ही है !

तो मेरी नजर में सारे के सारे दीवान नामालूम लोगों के ही है, ये अलग बात है कि उनकी गैर-मौजूदगी की वजह से हम उनके घर बने उन जैसे हमशक्ल और हमनाम लोगों को उनका शायर मान बैठते है ... 

मलाला अगर ड्रोन हमले में मारी जाती तो...?

हममे से कितनो को पता है, कि इराक और अफगानिस्तान में अमरीकी फौजो ने डीप्लेटेड युरेनियम का इस्तेमाल बमों में किया था ? आतंक के विरुद्ध युद्ध के समर्थन के नाम पर मचाये अमरीकी आतंक हमारी सवेदना से परे रहते है | दुनीया भर से अमरीका घुमने गए लोग औए साथ -साथ अमरीकी लोगों के लिए "ग्राउंड जीरो" आतंकवाद के क्रूर चेहरे की एक विलासितापूर्ण नुमाइश है, क्या जापान की हिरोशिमा -नागासाकी भी आतंकवाद की ही और उससे कई गुना ज्यादा क्रूर नुमाइश नहीं है ? क्या समूचा का समूचा अफगानिस्तान और इराक बेशर्म और बर्बर अमरीकी आतंकवादी गतिविधियों का बनाया ग्राउंड जीरो नहीं है ?

अमरीका महत्वपूर्ण है, स्नोडेन नहीं ! ब्लादिमीर पुतिन जो रूस के सोवियत युग की बची-खुची अकांछा के अकेले बचे प्रतिनिधि नजर आते है, इस बयान के साथ अमरीका के साथ साथ रूसी जनता को भी आश्वस्त करते है, नहीं घबराओ नहीं, हम अमरीका के ही साथ है, अमरीका, जो आज की दुनियाभर की मरीचिकाओ का प्रोजेक्टर है, उसका खुश रहना जरुरी है |

...और यहाँ अमरीका के मानी, वहाँ के असली निवासी रेड-इन्डियन वाला या उनको भी साथ लेकर चलने वाला अमरीका नहीं, वह अमरीका है, जो आक्रान्ता अप्रवासियो;- जिन्होंने मूल-निवासी रेड इन्डियन की हत्या की, उन्हें गुलाम बनाया और अमरीकी भूभाग पर जबरी कब्ज़ा किया;- का प्रतिनिधित्व करता है और यहाँ आप बराक ओबामा के चेहरे के धोखे में न पड़े, उनका चेहरा बस एक लिफ़ाफ़ा है, जिसका असल सामान से कोई सम्बन्ध नहीं |

अमरीका और ब्रिटेन ने मलाला युसुफजई को हाथो हाथ लिया, बीबीसी ने उसकी डायरी प्रकाशित कर कर के उसे एनी फ्रेक बना देने में कोई कसर नहीं छोड़ी, पर मलाला की तरह ही न जाने उसकी कितनी बहने, अमरीकी बमबारी में मारी गई, दुनिया भर में, और अफ़गानिस्तान तथा इराक में आज भी यह बदस्तूर जारी है...!

मलाला, ने बेशक, तालिबान के नक़ाब नोच फ़ेंके, बहुत खूब, पर जो मुह उसकी वाह-वाही में लगे है, नकाबपोश वो भी है, उनके चेहरों पे भी, मलाला युसुफजई की बहनों के खून के धब्बे है !

लोकतंत्र का मर्सिया और डुगडुग मदारी कम्युनिष्ट !

लोकतंत्र का मर्सिया पढ़ते छद्म बुद्धिजीवी, पूजीवाद की हाय हाय करते, माओ की पूजीवादी संतानों की चाकरी करते, भारत नाम के राष्ट्र राज्य की अवधारणा पर जब तब सवाल उठा कर, अपने जैसे मानसिक गुलामों की ही वाह वाह से आत्म मुग्ध भारत से बाहर बैठ कर, भारत की बात करते उनके गुलाम, या धर्म को घोर अनैतिक बताते हुए नास्तिकता को अपना धर्म के बुनियादी मानव मूल्यों की कभी भी चर्चा न कर अपने जनवादी शासक में समस्त मानवीय मूल्य होने के प्रपंच का पिंगल पढ़ते, हमारे परम ज्ञानी मित्र गण;
क्या आज की तारीख में, आपके पास कोई बस एक उदाहरण समूची दुनिया से है जहाँ :- संविधान एक समाजवादी समाज के निर्माण के लिए है और संविधान, कानून, अदालत और पुलिस का उपयोग जनता भी कर सकती है, और अत्याचारियों को सजा दिला सकती है? शासक वर्ग अपनी सत्ता का दुरूपयोग नहीं करता है ! जनता जिस कानून और मशीनरी का उपयोग करती है उसे सरकारे शसक्त करती है ! उन अदालतों और फोरम को ताकतवर बनाया जाता है, जो जनता के हित से जुड़े होते है ?

इस उदाहरण में आप लोकतंत्र , सैनिक तानाशाही , राजतन्त्र और हाँ सर्वहारा तंत्र (कम्युनिज्म) को भी शामिल कर सकते है !!!

कोई शाब्दिक बाजीगरी नहीं, बस हाँ या ना !!!

...अगर आपके पास इसका कोई जबाब नहीं, तो जनाब हम एक काल्पनिक दुनिया की बात पर, और उसपे भी तब , जब कि, आप सब अबतक यह ही नहीं तय कर पाए की स्टालिन सही है, या माओ या ट्राटस्की तो बस एक शब्दों के भरम पर, आपके प्रयोग के गिनी-पिग क्यों बने ? पिछले एक सदी में कम्यूनिस्टो ने अपने भ्रमजाल को बनाये रखने के लिए, जितना खून बहाया है, उसकी समझ के लिए लोकतंत्र के विरोधियों को किसी यंत्रणा शिविर में रख कर समझाने की जरुरत नहीं !

कम्युनिज्म के नाम पर, बीती सदी में, जितने भी सर्कस सजाये गए, वो आदमी को बस ज़ोकर बनाते और समझते रहे और शासक वहाँ रिंग मास्टर बने रहे ! बड़ी खूबसूरती से नारों को कम्युनिष्टो ने विचारधारा बना दिया, झंडे को भगवान, डंडे नियंत्रक शक्ति बन गए और, जिस सर्वजन की बात कर वो सत्ता में आते रहे, उन्ही में से कुछ को बाकी का "दुश्मन" बना कर, एक बर्बर युद्ध अपने ही लोगों से करते, अपनों का ही खून बहाते और खुद ही भविष्य में "जनता की जनवादी तानाशाही" का सपना दिखाते, अपने कृत्य के लिए "वाह रे हम !" कहते रहे |

मै तमाम बुराइयों के साथ भी, अपने लोकतंत्र का समर्थक हूँ, और हाँ, आप लोग डुगडुगी भी बजाये, डुगडुगी ! मदारियों के साथ वही फबती है !!!

क्या इशरत जहाँ आतंकवादी थी ?

व्यक्तिगत तौर पर, अबतक की रिपोर्ट और जाँच के आधार पर, मै मानता हूँ, कि इशरत जहाँ वाली मुठभेड़ फर्जी थी, पर जिस सवाल का जबाब मुझे आज तक नहीं मिला, वह यह कि क्या इशरत जहाँ, आतंकवादी थी अथवा आतंकवादियों से उसकी सांठ गाँठ थी, अथवा नहीं ?
दुर्भाग्य से, इस पूरे प्रकरण में दो पक्ष बन गए है, एक वो, जो इस मामले में नरेन्द्र मोदी को संलिप्त मान के या करके नरेन्द्र मोदी को हत्यारा - हत्यारा कहे जा रहे है और इशरत जहाँ और उसके साथ हत तीन लोगों को एक दम निःदोष साबित करने पर तुले हुए है, तो दूसरी तरफ इसका विरोधी पक्ष अपनी दलीलों में इशरत जहाँ पर, उसके चरित्र पर और उसके आतंकवादियों से संलिप्तता पर जोर-शोर से सवाल उठा कर, कथित मुठभेड़ की इस घटना को औचित्यपूर्ण साबित करने पर तुला हुआ है |

पर वास्तव में इस समूचे प्रकरण पर उठाये जाने वाले सारे सवाल और उसके दिए जा रहे जबाब, चाहे वो किसी भी तरफ से हो, बस लोगों को भरमाने की कोशिश है, दोनो तरफ के लोग “झूठे-झूठे” तथ्य परोसने में एक दूसरे को मात देने में लगे है, और अपनी अपनी प्रतिबध्ताओ की वजह से, बजाय की झूठ के पीछे के सच को सामने लाने के, एक तरफ मोदी विरोधी, मुठभेड़ की झूठी कहानी में ख़ूब सारे और झूठ जोड़ –जोड़ कर उसे एक बड़ा और बहुत बड़ा झूठ बताने में लगे है तथा एक अपराध को इतना जादा अतिरंजित करने की कोशिश में लगे है, जिससे सामान्य जन की भावनाओं को भड़का कर या आहत कर के वो अपना फायदा लूट सके, भले ही इस कोशिश में असली अपराधी, अंततः इन गढ़े झूठो की सत्यता पर सवाल खड़े कर बच निकले, तो दूसरी तरफ मोदी समर्थक पक्ष इशरत जहाँ के व्यक्तिगत चरित्र पर उसकी आतंकवादियों से संलिप्तता पर सबूत देने में, एफ बी आई को मात देने में लगे है, पर एक जिम्मेदार नागरिक के नाते इस समूचे प्रकरण से जुड़े असली सवाल कुछ और है, जिन्हें जान – बुझकर अनदेखा किया जा रहा है, क्योकि असली सवालो के जबाब, असल अपराधी को दण्ड तो दिला देंगे पर, इस प्रकरण पर राजनीति करने वालों के मंसूबे को पस्त कर देंगे, लिहाजा जो सवाल वाकई उठने चाहिए, उनकी बजाय बस भावनाओं को आहात करने का खेल खेला जा रहा है |

बेहद सीधे और सपाट तरीके से, इस समूचे प्रकरण में, जो बुनियादी सवाल है, वो यह है ;-
क्या मुठभेड़ असली थी ? अगर नहीं तो इसमें शामिल लोगों का इस मुठभेड़ की घटना के पीछे क्या उद्देश्य था ? क्या उक्त प्रकरण में नरेन्द्र मोदी की सीधे –सीधे कोई संलिप्तता थी अथवा क्या उक्त घटना की उनको पूर्व जानकारी थी ? क्या उक्त मुठभेड़ में गुजरात पुलिस और किसी अन्य सरकारी एजेंसी की भी संलिप्तता थी ? क्या चारो के चारो आतंकवादी थे ? अगर हाँ तो अतीत में उनकी गतिविधियाँ क्या –क्या थी ? अगर सभी आतंकवाद से नहीं जुड़े थे, तो क्या उनमे से कुछ की हत्या सिर्फ साथ होने की वजह से की गयी ?

बेहद बुनियादी इन सवालों के जबाब से सभी बच रहे है | साथ ही, इस समूचे प्रकरण में कई सवाल खड़े हुए है, मसलन ;-
= अगर “सीबीआई” इशरत और उसके तीन साथियों को निर्दोष मानती थी, तो पूर्व में उसने उन सभी के आतंकवादी होने का हलफ़नामा क्यों दिया ?
= अगर गुजरात पुलिस और विशेष जाचं दल के साथ –साथ “आईबी” भी इस प्रकरण में शामिल थी, तो एक केन्द्रीय एजेंसी होने के नाते, तत्कालीन केंद्र सरकार इस घटना से अनभिज्ञ कैसे थी ?
= अगर शाजिश के सूत्र नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक जाते है, तो चार्ज शीट में उनका नाम क्यों नहीं है ?
= अगर नौ साल के बाद भी, “सिबीआइ” मोदी और शाह के विरुद्ध सबूत ढूढने में नाकाम रही, तो पूरक चार्जशीट में उनके नाम शामिल हो सकते है, जैसे शगूफे क्या राजनितिक हानि-लाभ के आधार पर तो नहीं दिए जा रहे ?
= “सीबीआई” ने अपनी समूची चार्जशीट में इशरत या उसके साथियों के आतंकवादी होने, आतकवादियो से संपर्क होने, लश्कर या ऐसी ही किसी एजेंसी से उसके सम्बन्ध होने जैसी बातों पर एकदम चुप्पी साध रखी है, क्यों ?
= “सीबीआई” की समूची चार्जसीट में “एफ़ बी आई” को डेविड कोलमैन हेडली के इकबालिया बयान का कोई सन्दर्भ नहीं, क्यों ?

लिहाजा यह बेहद जरुरी हो जाता है, की उक्त समूचे प्रकरण पर हम किसी भी निष्कर्ष पर न पहुचे और इस समूचे प्रकरण को हमारी सरकारों की एक और नौटंकी मात्र मान ले , यह बहुत जरुरी है की हम अपने को इस सरकारी तमाशे में न उलझा कर, बेवजह बहस, तर्क-वितर्क में लगे रह कर उन बेहद बुनियादी सवालों से भटक जाए, जिनको पूछा जाना, जिनका उठाया जाना बहुत ज़रूरी है !

... “सीबीआई” ने एक और चार्जशीट दाख़िल की है, जिसमे कांग्रेस के एक दागी पवन बंसल का भी नाम नहीं है !!!
 

एक निष्कर्ष बजरिये दो कथाए ...!

एक कहानी भाई Azhar Khan के स्टेटस से;-
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एक बार की बात है एक गाँव में चर्चा हो रही थी की दो और दो कितना होता है ? सभी ने कहा इस पर वोटिंग कराओ , गाँव के सभी लोगों ने वोट दिया की दो और दो पांच होते हैं सिवाए एक गांववाले के जिसका कहना था की दो और दो पांच किसी सूरत में नहीं हो सकते अगर ऐसा हुआ तो दुनिया के सारे नियम, सारे कायदे कानून ,सिद्धांत पलट जायेंगे | गाँव वालों ने उस से कहा की मूर्ख तू क्या नहीं जानता की 'लोकतंत्र' में जो बहुमत में होता है वही सच होता है बाकी सब झूठ ,उस अकेले गाँव वाले ने बहुत तर्क दिए, समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन उन गाँव वालों को कुछ नहीं समझ आया बात आगे बढ़ने लगी ,गाँव वालों ने उस अकेले को धमकी दी की अगर आगे से तूने दो और दो चार बताया तो तुझे मृत्युदंड दिया जायेगा इससे वोह गाँव वाला डर गया और वोह गाँव छोड़ कर चला गया बस तभी से उस गाँव में अब दो और दो पांच होता है|
----लघु कथा कल्पना पर आधारित है और तथाकथित 'लोकतंत्र' की सचाई भी बताने का प्रयास है !
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एक कथा भाई Kashyap Kishor Mishra की उसके जबाब में ;-
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एक बार की बात है एक पोलित ब्यूरो में चर्चा हो रही थी की दो और दो कितना होता है ? छः -आठ दिन के गहन विचार मंथन के बाद यह तय हुआ कि सबकी राय इसपे अलग -अलग है, लिहाजा केन्द्रीय समिति ने निर्णय लिया दो और दो दस होते है , पोलित व्यूरो के कुछ सदस्यों की राय में दो और दो चार होते थे, लिहाजा उन्होंने केन्द्रीय समिति के राय से ना ईतिफाक जाहिर किया , उनका कहना था की दो और दो पांच किसी सूरत में नहीं हो सकते अगर ऐसा हुआ तो दुनिया के सारे नियम, सारे कायदे कानून ,सिद्धांत पलट जायेंगे ! केन्द्रीय कमिटी ने उन्हें समझाया की मूर्ख तू क्या नहीं जानता की 'साम्यवाद र' में जो केन्द्रीय कमिटी " कहती है वही सच होता है बाकी सब झूठ ,उन कुछ पोलित सदस्यों ने बहुत तर्क दिए, समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन केन्द्रीय कमिटी ने उन्हें नाफ़रमानी का दोषी मान "श्रम शिविर " में भेज दिया , जिससे उनके भीतर से लोकतंत्र वाली "वाद विवाद संवाद " वाली कुत्सित आदत छूट जाये और जो केन्द्रीय कमिटी का निर्णय वो सबका निर्णय के साथ वो रोबोट की तरह आदेश पालन कर सके !
-- लघु कथा कल्पना पर आधारित है और तथाकथित 'साम्यवाद ' की सचाई भी बताने का प्रयास है !
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कुछ निठल्लों का निष्कर्ष ;- व्यक्ति कभी भी अपने राग -द्वेष से मुक्त नहीं हो सकता, लिहाजा मानव संचालित किसी भी तंत्र में दोष रहेगे ही, पर व्यक्ति को भेड़-बकरी बनाने वाली व्यवस्थाओ के मुकाबले, मनुष्य की व्यक्तिगत पहचान और मानवीय गरिमा को सर्वाधिक सम्मान देने वाली व्यवस्था सर्वश्रेष्ठ होती है, लिहाजा किसी भी शासन पद्धति के मुकाबले लोकतंत्र सर्व-श्रेष्ठ शासन पद्धति है !
 

...औरत !

प्रेम ने , वात्सल्य ने और उन सभी गुणों ने, जिन्हें समाज स्त्रेण कहता है, समाज को सभ्य बनाने में सर्वाधिक मदद पहुचायी है | मनुष्य की बर्बर हिंसक प्रविर्ति ने कभी किसी सभ्यता को विकसित नहीं किया, हां सभ्यताओं को नष्ट ज़रूर किया, शक यवन, हूण, तातार लड़ाके थे, लूटमार करते थे, और इनके पास काफी सारी सम्पदा थी, पर इनकी किसी विकसित सभ्यता के प्रमाण हमारे पास मौजूद नहीं है |
अतीत में, जिन समाजों में, स्त्री अगुवाई कर रहीं थी, सभ्यताए वही विकसित हुई, पर कालान्तर में, इन सभ्यताओं ने स्त्री को "मातृदेवी" बना कर, अथवा "कामरूपा" बना कर चहारदिवारी के भीतर कर दिया और खुद इनकी नियंता बन गयी |
स्त्री की स्वभाव की कोमलता, दयालुता, समर्पण भाव का इस्तेमाल कर स्त्री को निरुद्ध कर दिया गया और पुरुष समाज की दिशा-निर्देशक ताकत की अगुवाई करने लगा, जिसे एक क्षद्म नाम दिया गया "पुरुषार्थ" !
बदलते वक़्त के साथ, स्त्री और उसकी भुमिका बदली पर उसकी अधिकतम सीमा "सह-चरी" पर आ कर रुक गयी, जबकि स्त्री समाज के बाकी आधे हिस्से के मुकाबले, जादा समर्थ, जादा जिम्मेदार और जादा सहिष्णु है |
...और आज, एक स्त्री जो जननी है, अपने अधिकार के लिए लड़ाई लड़ने को मजबूर है, इस लड़ाई को वह सबसे लड़ेगी, उनसे भी जिनसे उसे नफरत है और उनसे भी जिन्हें वो बेइंतिहा प्यार करती है, उसकी लड़ाई जारी है और आगे भी जारी रहेगी, सबसे उस समाज से, जो उसपर पाबंदियो की बात करता है और विद्रोहिनी स्त्री पर लानते भेजता है, और साथ ही उस घर से भी, जिसे मकान से घर वो खुद बनाती है |
पर अंतत ...! स्त्री हमेशा हार जाती रही है, अपने ही जने से ! एक औरत के भीतर बैठी "माँ" उसे अपने बेटे को दुलारते तो स्वीकारती है, पर अपनी मुक्तियात्रा के एक अवरोध के रूप में अपने बेटे को स्वीकार नहीं पाती, लिहाजा एक औरत के चेतन मुक्ति शंघर्ष में, बेशक दुनिया के सारे मर्दों से लड़ने की बात हो, पर उस औरत का अवचेतन, बेटे को उस युद्ध में एक मर्द के रूप में नहीं देख पाता !
...कुल मिला कर,यह एक बहुत अच्छी बात है, मर्दों और उनके अहंकार से युद्धरत एक स्त्री, बुनियादी रूप से एक माँ है, जो झाँसी की रानी भी है और पीठ पर अपने बेटे को बांधे, साथ-साथ ही, एक माँ भी है |
तो एक औरत के लिए अपने मुक्ति संघर्ष के दौरान यह बहुत जरुरी है, की एक तरफ तो वह अपने गैर बराबरी के विरुद्ध लड़ेगी तो दूसरी तरफ़ अपने बेटे को औरतों की इस गैर बराबरी के विरुद्ध तैयार भी करेगी ! यह तैयारी, औरत की आज की मुक्तियात्रा के किसी भी पड़ाव से बड़ा पड़ाव होगी |
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सन्दर्भ ; बहन Manisha Pandey का स्टेटस ;-

हर इतिहास, हर दर्शन, हर राजनीति में औरत द्वितियक है और इसे समझना जरा भी कठिन नहीं, आप नहीं समझ रहे लिहाजा इसे हल्का कर रहे हैं, कुतर्क कर रहे हैं और फिर उम्‍मीद कर रहे हैं कि आपकी नीयत पर भी शक न किया जाए। क्‍यों?
सबकी लड़ाई के साथ औरतों की लड़ाई अलग से भी लड़ी जाएगी। आप ही से लड़ेंगे। बाप से लड़ेंगे, पति से लड़ेंगे, भाई से लड़ेंगे, साथी कॉमरेडों से लड़ेंगे, आंदोलन के नेतृत्‍वकर्ताओं से लड़ेंगे। पार्टी महासचिव से लड़ेंगे। आपके संग मिलकर औरों के लिए तो लड़ेगे ही, लेकिन अलग से आपसे भी लड़ेंगे। आखिर आप भी तो ठहरे मर्द ही।
 

आप गाय काटो, आपका पड़ोसी सूअर काटे ...!

अल्लाह ने कुरआन में कहाँ "गाय " का मांस खाने की इजाजत दी है ? अल्लाह कहता है, "वो हर चीज खाओ जो मैंने तुम्हारे खाने के लिए पैदा की है" अल्लाह यह भी कहता है "अमन का काम करो" आप गाय खाइए, शौक से मगर कुरान इस मुल्क से और इसके अवाम से बड़ी नहीं है, और न ही समाज के अमन चैन को "कुरआन" की आयतों की बिना पर भंग करने की इजाजत दी जा सकती है, कोई भी मजहबी किताब, कोई भी, फ़कत कुछ लोगों की बाकी सारे लोगों को उल्लू बनाने की साजिश है, अगर वह आदमी की जाती सोच को कट्टरवाद की जानिब ले जाती है और अपने समय, समाज और क़ायदे के लिहाज से आपको बोदा बनाती है|
बहुतों के लिए, जिसमे बहुत सारे मुसलमान भी है, कुरआन के मानी "शैतानी आयतें" भी है, इस तरह, आप बेशक अपने आप को अपने दिए कुरआन के मानी से आलिम समझते रहें पर नफ़रत को शह देने वाले एक छोटे से अमले के अलावे बाकी के लिए आप जाहिल इंसान है | किसी को भी, कतई यह हक़ नहीं की वह तय करे की चाहे अकबर हों या ग़ालिब, वो मुसलमान है, या नहीं ? इस तरह की बात करने और नारे उछालने वालों ने ही, मजहब को "गटर" में तब्दील कर दिया है |
आप बेशक गाय काटिए पर तब अपने दरवाजे पर सूअर काटे जाने पर हुआ -हुआ मत करिए | आप बनिए "मौदूदी" वाले मुसलमान मगर याद रखिये जब आपके ही चेले फ़ीता लेकर आपकी दाढ़ी नापने चलेगे तो बचाने न तो कुरान कभी आयेगी न कभी आयी है |
अमन की बात करने वाले डरपोक नहीं होते, क्योकि सबसे पहली लड़ाई उन्हें उन अपनों से ही लड़नी पड़ती है, जो तलवार लेकर "क़त्ल -क़त्ल " के नारे लगा रहे होते है और तलवारे सिरफ गर्दन पहचानती है और तलवार की बात करने वालों की नफरत सिरफ कत्ल की जुबान समझती है, तो अमन की बात करने वाले, सबसे बहादुर लोग होते है और ख़ुदा भी उनकी बंदगी करता है, क्योकि अगर ख़ुदा ने ये दुनिया बनायीं है, तो उसकी हिफ़ाजत अमन पसंद लोगों की वजह से ही है |
चरमपंथी होने का घटियापन हर मजहब में है, कही वह जालीदार टोपी के नीचे के आदमी में है, तो कही वह टीका लगाये आदमी में है |
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यह आलेख 
भाई Sharif Khan की एक टिप्पड़ी, जो मेरे मित्र Azhar Khan की वाल पर थी, उसके जबाब में था...! 
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"अल्लाह ने चूँकि गाय का मांस खाने की इजाज़त दी है इसलिए किसी भी इन्सान को इस पर पाबन्दी लगाने का हक नहीं है। जहाँ तक अकबर बादशाह की बात है तो वह तो मुसलमान ही नहीं था। मथुरा के मुसलमान हों या किसी दूसरी जगह के हों, वह हिन्दू चरम पंथियों के डर से गाय पर पाबन्दी की बात करते हैं।"

बच जाएगी गौरयाए...!

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एक कटोरी दाना पानी,
छत पे छोड़े टांड पुरानी,
बच जाएगी गौरैयाए ....
टिल्ली लिल्ली
भाग शिकारी !
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मेरे कम्युनिष्ट भाई और उनका रक्ताभ आकाश !

मेरे कुछ भाई कम्युनिस्ट है, इनके सपनों का आकाश नीला नहीं है ! आकाश और इनके मध्य एक रक्ताभ परत है, जो ठीक इनकी आँखों की मोतिया पर है, लिहाजा आकाश, चाँद, समन्दर, धरती सब के सब इन्हें लाल दिखते है, ऐसा लगता है "लाल-बुझक्कड़" शब्द का आगाज भी मार्क्सवाद की दलीलों के साबके के बाद हुआ होगा |

मुझे माफ़ करे, वे तमामो तमाम वामपंथी जो सचमुच प्रतिबद्धता से गरीबो-मजलूमों की बात करते थे, सत्य के साथ खड़े रहते थे, पर आज के वामपंधी ज्यादा कुछ नहीं, सिवाए उजबको के एक समूह के, हालाकि अपवाद अभी भी है, सही और ईमानदार लोग अभी भी वामपंथ से जुड़े हुए है, पर बहुतेरे अब चीन के चंदे और चाटुकारिता को अपने विलास का माध्यम बना चुके है, जिसमे नक्सल लुट से आने वाली आय का अंश, उपरी कमाई होती है|

विगत कुछ दिनों में , अपने कुछ वामपंधी बन्धुओ से विमर्श के दौरान मैंने पाया की वामपंथ, कम से कम आज की तारीख में एक अजायबघर से कम नहीं है, अजब-ग़जब लोग अजब ग़जब बातें, जिनका कोई नैतिक आधार नहीं होता, जिनकी बातों में कोई अन्तर्सम्बन्ध नहीं होता और ज्यादातर संवाद का हिस्सा असम्बद्ध और फिजूल का होता है| ये नक्सली हिंसाओ पर उन्मत्त नृत्य करेगें, पर अगर आपने नक्सलियों से कड़ाई से निपटने की बात की तो आपको पूंजीपति दलाल बता देंगे, आप जबतक इनके हां में हां मिला रहे है, आप साथी है, जहाँ आपने अपनी असहमति जताई, ठीक उसी वक़्त आप के ख़िलाफ़ अपशब्द शुरू हो जायेगे, तत्क्षण ही ये आपको मानसिक बीमार घोषित करने लगेगे, आपको हत्यारी सरकार के साथ खड़ा करने लगेगे और खुद को जनता की तरफ बताने लगेगे|

कभी पढ़ा था गुलाम का अपना कोई धर्म नहीं होता जो मालिक कहे वही उनका धर्म होता है, ऐसा प्रतीत होता है, चंदाजीवी हमारे ये भाई वही बोलने को मजबूर है, जो इनके मालिक इन्हें बोलने को कहते है, ये जनता की तरफ होने का नारा लगा कर चीन की पाव-बोशी करते है और आपको सरकारी जासूस ठहरा देंगे, अगर आप ये कहते है, कि आप हिंसा के विरुद्ध है, चाहे सरकारी या नक्सली, तो एकाएक इनमे से एक मेढ़क, आपको बिना पेंदी का लोटा बना देगा, इन मूर्खो को ये नहीं पता, पट्टे जानवर पहनते है और सत्य के साथ विचारशील जन रहते है|

मैंने अपने आप को कभी भी, गांधीवादी नहीं कहा है, बस इतना कहता हूँ, मै गाँधी का सम्मान करता हूँ और उन्हें गाली नहीं देता, मैंने अभी तक अपने आपको किसी खूटे से नहीं बाँधा है, और वस्तुतः अभी खुद से चल रहे आत्मसंवाद में , मै अभी खुद को ढूढ रहा पाता हूँ, खुद के अभिज्ञान की मेरी यह यात्रा पूर्णतः "नैतिक और आध्यात्मिक" है | पर विरोध के मुखर स्वर में बोलते मेरे भाई, अक्सर मेरी नीयत, जानकारी और मानसिकता पर सवाल उठाते ही रहते है, मजेदार बात तो यह कि एकदम यही सवाल इनके मुखर विरोधी भी मेरे प्रति उठाते है, जब मै इनकी किसी विचारधारा से सहमति जताता हूँ|

लिहाज़ा मै क्यू न ये मानू की उतने ही कठमुल्ले आप भी है, जितने की आपके वो विरोधी, जिनके धार्मिक कठमुल्लेपन के विरोध की आप डींग हाकते है, अंतर बस यही है, कि आपका धर्मग्रन्थ "माओवादी" साहित्य हो चूका है और माओ स्टालिन ख्रुश्चेव की मुर्तिया आपकी भगवान् हो चूकी है, उनको दंडवत करते आप भी उतने ही अंधे रहते है, जितने उपासनास्थल के नाम पर तलवार उठाये कोई कट्टर धार्मिक और बिना विचारे जो लिखा है के मामले में आपने माओ/मार्क्स के साहित्य को कुरान बना दिया है, जिससे इतर कुछ नहीं |

मेरे कुछ बंधुओ ने, हत्यारी "सी.आर .पी एफ" को मुझसे बेहतर बताया है, ऐसा करना कही न कही उनकी बड़ी मज़बूरी है, क्योकि अतीत में अक्सर मै यह कहता रहा हूँ, की "एक बन्दूक उठाए आदमी को अपने विरोध में बन्दूख उठाये आदमी से उतना खतरा नहीं होता जितना उस आदमी से जो यह कहता है, कि बन्दूक उठाना ग़लत है, क्योकि बन्दूक उठाये दोनो आदमी की मानसिकता "हत्यारी" है और जो व्यक्ति इस हत्यारी विचारधारा को ग़लत कहता हो, वो बन्दूक उठाये आदमी का सबसे बड़ा विरोधी होता है"

नक्सलियों के मेरे विरोध को मेरे भाई मुझे "दलित -आदिवासी" विरोधी घोषित कर देते है, ऐसे आरोपों पर सहज ही मुस्कुराया जा सकता है, बात नक्सलियों की हो रही है, बात हत्यारों की हो रही है , "दलित-आदिवासियों " का मुद्दा और उनकी पीड़ा अलग है,जिन्हें सिर्फ और सिर्फ इस्तेमाल किया जा रहा है और ये इस्तेमाल सिर्फ सोनभद्र (यू.पी ) झारखण्ड, बिहार , छत्तीस गढ़ में ही नहीं नार्थ ईस्ट से लेकर और गढ़चिरौली, बेलापल्ली तक हो रहा है, और ऐसा नहीं है की ये बातें मै सुनी-सुनाई या पढ़ कर कह रहा हू, शायद ही इनमे से कोई राज्य और उनके आदिवासी इलाके मुझसे बचे होंगे तो यही कठिनाई है, सबसे बड़ी कठिनाई की मैंने सच देखा हुआ है और सच बोलता हूँ, लिहाजा शब्दाडम्बर से और तथ्यों से छेड़छाड़ करने वालों को कठिनाई तो होगी ही|

...अब चीन में "जनता की जनवादी तानाशाही" है, का दावा मै नहीं कर सकता, हां इस दावे पर सामने वाले के लिए ईश्वर से प्रार्थना जरुर करुगा|

कम्युनिज्म कुछ सवाल-उनके जबाब ...

कम्युनिज्म विचारधाराए, एक वर्ग-विहीन और राज्य विहीन समाज की बात करती है, फिर शासक की अवधारणा कम्युनिष्टो में कैसे है ?
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आदिम, धार्मिक और यूटोपिया के कम्युनिज्म विचारधारा से इतर आधुनिक कम्युनिज्म का जनक कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स को मानते है, मार्क्स के अनुसार कम्युनिज्म में जनता को कोई नेता/ शासक नहीं होता, जनता अपने आप को "खुद शासित" (?) करती है, पर लेनिन ने इस विचार को दफ़न कर दिया, लेनिन का मानना था की जनता को "निर्देशित" करने के लिए, एक शासक संस्था (governing body ) का होना आवश्यक है, लेनिन के इस विचार ने दुनिया भर में कम्युनिष्ट शासको को, तानाशाह बनने का मार्ग प्रशस्त किया, जोसेफ स्टालिन रूस में लेनिन के तुरंत बाद एक क्रूर तानाशाह के रूप में सामने आया, चीन का कम्युनिष्ट शासन अपने शासक चरित्र में अत्यंत क्रूर है, उत्तर-कोरिया में तो किम परिवार का ही तानाशाही शासन है | क्यूबा में भी कास्त्रो के बाद, उसके छोटे भाई ने नियंत्रण सम्हाला हुआ है | वर्तमान कम्युनिष्ट राज्य अपने नागरिकों के किसी भी, विरोधी विचार को कतई सहन नहीं करते और बड़ी ही सख्ती से विरोध का दमन करते है |
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तो क्या शासक और शासित, कम्युनिज्म में" अपने आप में दो वर्ग नहीं ?
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कम्युनिज्म आदर्श रूप में, एक मुद्रा विहीन समाज की कल्पना करता है, जहाँ उत्पादन के सभी साधन का मालिक समाज होगा, ऐसा समाज जो न तो गरीब होगा, न अमीर और मशीनीकरण का लाभ एक मजदुर को सहूलियत के रूप में लिया जायेगा, न की अमीर के लाभ अर्जित करने के यंत्र के रूप में,चूकि उत्पादन के सारे साधनों पर समाज का (राज्य का नहीं ) अधिकार होगा और मुद्रा नहीं होगी, लिहाजा शासक सिर्फ एक ताकतवर मनुष्य होगा, शासक की हैसियत भी जनता के जनवादी प्रतिनिधि की होगी और एक कम्युनिष्ट समाज "जनता की जनवादी तानाशाही" होगा |
पर किसी भी कम्युनिष्ट राष्ट्र में जनता अत्यंत तुच्छ बनी रही, परंपरागत रूप से कम्युनिष्ट राज्यों ने, उत्पादन के अधिलाभ का इस्तेमाल जनता के बीच कर उनकी सुख शांति समृद्धि में अभिवृद्धि की बजाय, युद्ध के उपकरण और सैनिक साजोसामान पर बेइंतिहा खर्च किया, राष्ट्र विहीन समाज का सपना दिखाने वाले कम्युनिष्ट विचारधारा में राष्ट्र एक "पीड़क" प्रतीक है और शासक जल्लाद !
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...तो जनता की जनवादी तानाशाही ?
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मूर्खो के पास श्रम बल होता है, समझदार किसान बैल के आँखों के बगल ढक्कन लगा देता है, और सामने हरा चारा लटका देता है, बैल चारे के लिए बढ़ते है, चारा बैल के साथ-साथ आगे बढ़ता जाता है, किसान की बैलगाड़ी चलती रहती है, बैल को कितना और कब चारा देना है, यह किसान की मर्जी होती है, बैल अपने चारे तक खुद कभी नहीं पहुचता, "जनता की जनवादी तानाशाही" ऐसा ही चारा है, सबसे मिहनत कश लोग सबसे पहले बेवकूफ बने और कम्युनिष्ट बन गए, जो खुद नहीं बने, क्रांति की मारकाट से डर के बना दिए गए |

Tuesday, August 6, 2013

हिरोशिमा और नागासाकी का सच ...!

एक चीनी लोककथा के अनुसार क्वी नाम की एक चीनी राजकुमारी ने चिर-यौवन प्राप्त करने के लिये, अपने देश के नाविकों को दुनिया भर में ‘चिर-यौवन का फव्वारा” ढूढने इस आदेश के साथ भेजा कि वो तबतक लौटकर वापस ना आये, जबतक कि वो वह फव्वारा ढूंढ ना ले, असफल राजभक्त नाविक चीन वापस नहीं लौटे और वो समुन्द्र के एक टापू पर बस गए, जिसे हम जापान के नाम से जानते है | बाद में राजकुमारी की मौत के बाद भी, वो नाविक लौट कर चीन वापस नहीं गए, क्या हुआ राजकुमारी नहीं रही, आदेश तो है, लिहाजा जबतक वो आदेश पूरा नहीं कर लेते उन्होंने ख़ुद को स्वनिर्वासित कर लिया, सच – झूठ से इतर यह कहानी जापानियों के स्वभाव को दर्शाती है, उनके निष्ठां बोध को दर्शाती है...|

दूसरे महायुद्ध में, जापान मित्र –राष्ट्रों के विरुद्ध लड़ रहा था, भविष्य में लिखे गए विजेताओं के इतिहासकार भले ही जापान को अन्य धुरी राष्ट्रों के साथ-साथ युद्ध अपराधी कहते है, पर वक़्त के पलड़े पर महायुद्ध के दोनों पक्ष पीड़क ही थे और अपने तर्कों के साथ पीड़ित भी, लिहाजा साम्राज्यवाद की लिप्सा में हो रहे उस युद्ध में दोनों पक्ष मानवता को शर्मशार करते हुए उससे युद्धरत थे, पक्ष –विपक्ष तो प्रहसन के चोले मात्र थे |

अमरीका अपने हितो को सुरक्षित रखते हुए प्रत्यक्ष युद्ध से अलग बना हुआ था, हलाकि चर्चिल और रूजवेल्ट के मध्य नवम्बर -41 तक अमरीका के भी अंग्रेजो के पक्ष में युद्ध में शामिल होने की करीब- करीब सहमति हो चुकी थी, की तभी जापान ने 07-दिसंबर -1941 को, पर्ल हार्बर पर हमला कर दिया और अमरीका विश्व युद्ध में उतर गया, इतिहासकारों ने, जापान के पर्ल हार्बर पर हमले को, अमरीका के युद्ध में शामिल होने के उत्प्रेरक के तौर पर चिन्हित करने की भरसक कोशिश की पर वस्तुतः उस वक़्त तक अमरीका युद्ध के लिए एकदम तैयार बैठा था और साथ ही तत्कालीन युद्धक दशाओ को देखते हुए वह हमला पूर्णतः संभावित भी था, अमरीका के पास जापान के उसके नौसेनिक अड्डे पर होने वाले हमले की पूरी गोपनीय - सूचना भी थी, पर पर्ल हार्बर को वो "डिकोड" नहीं कर पाए और उनका ध्यान प्रशान्त क्षेत्र की तरफ था, पर्ल हार्बर एक नौसैनिक अड्डा था, और उस हमले में कुल 2350 लोगो की मौत हुई, जिनमे 68 सामान्य नागरिक थे, जो उस अड्डे पर अन्य सेवाओ से जुड़े थे|

1945 का उतरार्ध आते-आते, मित्र राष्ट्रों की विजय सुनिश्चित हो चुकी थी और युद्ध अब विरोधी राष्ट्र को पराजित करने से ज्यादा एक राष्ट्र के तौर पर अपने विरोधियों का मनोबल तोड़ना उन्हें शर्मिंदा करना और अपने प्रभुत्वशाली होने की नुमाइश करना रह गया था, वास्तव में सन पैतालिस के उतरार्ध में चल रहे युद्ध के पक्ष विजेता और पराजित नहीं बल्कि विजेता राष्ट्रों की आपसी प्रभुत्व स्थापित करने की होड़ थी, लिहाजा यह कहना जादा उपयुक्त होगा, कि पैतालिस के उतरार्ध की लड़ाईयां अब विजेताओं की आपस में प्रभुत्व स्थापित करने की लड़ाईयां थी |

30 अपेल को, हिटलर ने आत्महत्या कर ली और तबतक यूरोप पर मित्र राष्ट्रों का कब्ज़ा पूरा हो चुका था, 08 मई 1945, को "विक्ट्री इन युरोप डे" मनाया जा चुका था और उसकी पूरी तड़क-भड़क के साथ 09 मई 1945 को रूस ने अपनी जमीन पर जर्मनी से आत्मसमर्पण का दुहराव करवाता प्रहसन भी किया, विश्वयुद्ध के सुनिश्चित अंत के साथ-साथ अब निश्चित यह करना रह गया था, कि भविष्य में अब विश्व का कोतवाल कौन होगा, ब्रिटेन जो अबतक अपने आपको सबसे ताकतवर साम्राज्यवादी राष्ट्र मानता और दिखाता रहा था, विश्वयुद्ध से बुरी तरह टूटा हुआ था जबकि सोवियत संघ और अमरीका बेहद ताकतवर शक्ति बन कर उभरे थे, अमरीका युद्ध में बाद में शामिल हुआ था, लिहाजा सापेक्षिक रूप से उसके रूस के मुकाबले फ़ायदे अधिक थे और क्षति कम थी, रूस लेनिनग्राद में मानव इतिहास के सबसे सख्त युद्ध के दौर से गुजरकर विजेता बना था, पर सोवियत संघ पर बीते तेईस वर्षो से कम्युनिष्ट तानाशाह स्टालिन का शासन था, जो अत्यंत दम्भी था, लिहाजा प्रभुत्व स्थापित करने के द्वन्द में वह अमरीका के सामने चुनौती बन कर खड़ा था|

इसी दौरान 17-07-1945 से 02-08-1945 तक जर्मनी के पाट्सडैम में हुए "पॉट्सडैम सम्मलेन" जो कि चर्चिल (बाद में एटली भी), हैरी ट्रूमैन और स्टालिन के बीच हुआ था, अमरीकी राष्ट्रपति ट्रूमैन और स्टालिन के बीच शुरू हुई प्रभुत्व की तनातनी जगजाहिर भी हो गयी, अमरीकी राष्ट्रपति ट्रूमैन को पता था, कि भविष्य में अमरीकी प्रभुत्व के सामने अगर कोई ताकतवर प्रतिद्वंदी है, तो वह कम्युनिष्ट रूस ही है पर समस्या यह थी की रूस की लाल सेना और रुसी जनता की दुर्दमनीय जिजीविषा ने पूरी दुनिया को दिखा दिया था, कि रुसी कभी भी-किसी भी दशा में पराजित न होने की मनोवृति वाली मिट्टी से बने मनुष्य है, लाल सेना ने यह भी दिखा दिया कि युद्ध के उसवक्त के सारे के सारे परंपरागत तरीको में वह अत्यंत प्रभावी है, लिहाजा अमरीका को यह पता था कि दुनिया पर प्रभुत्व स्थापित करने के पहले उसे रूस से पार पाना होगा और उस वक़्त तक के सामरिक संतुलन के लिहाज से रूस किसी भी लिहाज से अमरीका से उन्नीस नहीं था| इसी दौरान अमरीका ने परमाणु –परिक्षण “ट्रिनिटी-टेस्ट” किया जो सफल रहा और उसके नतीजो की 16 जुलाई को मिली जानकारी के साथ ट्रूमैन 17 जुलाई से शुरू होने वाले "पॉट्सडैम सम्मलेन" में गए |

ट्रूमैन को यकीन था, कि अमरीका की यह सफलता उसे सोवियत रूस के मुकाबले श्रेष्ठता के इस जंग में बीस साबित करेगी और अमरीका की यह सफलता स्टालिन को भयभीत करने के लिए पर्याप्त है, लिहाजा ट्रूमैन ने सम्मलेन के दौरान बड़े ही गर्व से अपने सहयोगी राष्ट्राध्यक्षो के सामने घोषित किया कि “हमने दुनिया के इतिहास में सबसे भयानक बम का आविष्कार किया है” उन्होंने ऐलान किया की अब “अमरीका के पास एक नया सुपर-हथियार है” अपनी इस घोषणा के साथ ट्रूमैन स्टालिन की आँखों में उभरने वाले डर और खौफ़ की लकीरों को देखना चाहते थे, पर परमाणु जानकारी के लिए उस दौरान राष्ट्रों के मध्य चल रही ख़ुफ़िया गतिविधियों जिन्हें “एस्पिओनेज” कहते थे, के जरिए स्टालिन को अमरीका के “ट्रिनिटी टेस्ट” के नतीजो की पूरी जानकारी थी, साथ ही रूस भी इस नाभिकीय बम की दौड़ में पीछे नहीं था, लिहाजा स्टालिन का चेहरा ट्रूमैन के इस ऐलान के बाद भी एकदम भावहीन बना रहा, स्टालिन के भावहीन चेहरे ने, अमरीका के अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के इस मानसिक युद्ध में उसे तगड़ी पटखनी दे दी थी, जो अमरीकी राष्ट्रपति के लिए एक जबरजस्त झटका था |

अब अमरीका को किसी भी तरह से ख़ुद को साबित करना था, अमरीका स्टालिन को यह बताने को बेताब था कि युद्ध के बाद दुनिया का भाग्य विधाता अब सिर्फ और सिर्फ वह होगा | पॉट्सडैम सम्मलेन 02-08-1945 को समाप्त हुआ, अभी जापान ने हथियार नहीं डाले थे पर मित्र राष्ट्रों की उस दौरान चल रही "फायर बोम्बिंग कैंपेन" की वजह से ज्यादातर जापानी शहर एकदम तबाह हो चुके थे, जापान हरेक मोर्चे पर हार रहा था, जापानी युद्ध-पोत परिवेष से लगभग लुप्त हो चुके थे और जापान के आकाश पर मित्र –राष्ट्रों के विमानों का पूरा कब्ज़ा था कि अमरीका ने रूस के सापेक्ष अपनी श्रेष्टता स्थापित करने के पागलपन में, मानवता के इतिहास के सबसे बड़े अपराध को अंजाम दिया ...

6 अगस्त 1945, को नागासाकी और 9 अगस्त 1945, को हिरोशिमा पर अमरीका ने परमाणु हमला किया, जिसमे डेढ़ लाख से ढाई लाख के बीच लोग मारे गए, जो कि सामान्य नागरिक थे, हिरोशिमा या नागासाकी में, जापान का ना तो कोई सैन्य जमावड़ा था, न ही कोई हथियार का या सैन्य आपूर्ति से जुडा कोई भी कारखाना था, न ही उक्त दोनों शहर किसी भी तरह से सैन्य महत्व के थे |अमरीकी राष्ट्रपति ट्रूमैन, जिसने परमाणु हमले का निर्णय लिया था, को अपने इस मानवता को शर्मशार करनेवाली मानव इतिहास के इस जघन्यतम कृत्य का कोई अफ़सोस नहीं हुआ 1963 में उसने अपनी डायरी में लिखा था मै जानता था, मै क्या कर रहा हूँ, जब मैंने युद्ध समाप्त किया | मुझे कोई ग्लानि नहीं है और उन्ही दशाओ में मै पुनः ऐसा ही करता | 

दो विजेता राष्ट्रों के आपसी द्वन्द की कीमत जापान को अपने डेढ़ लाख से ढाई लाख के बीच सामान्य नागरिकों की जान से चुकाना पड़ा और इस बार इन निष्ठावान नागरिको के पास किसी अन्य टापू का विकल्प कतई नहीं था ...